मुजफ्फरपुर :कीमती पेड़ भविष्य का फिक्स्ड डिपॉजिट

मुजफ्फरपुर : मीनापुर प्रखंड के मोथहां माल गांव के मो हैदर अंसारी स्नातक हैं. वह रेलवे की नौकरी में जाना चाहते थे. उन्होंने डीजल मैकेनिक का कोर्स भी पूरा कर लिया था. उस वक्त मां ने कहा – बेटा क्या सरकारी नौकरी के चक्कर में पड़े हो, खेती में अपना भाग्य आजमाओ. मां की बात […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
मुजफ्फरपुर : मीनापुर प्रखंड के मोथहां माल गांव के मो हैदर अंसारी स्नातक हैं. वह रेलवे की नौकरी में जाना चाहते थे. उन्होंने डीजल मैकेनिक का कोर्स भी पूरा कर लिया था. उस वक्त मां ने कहा – बेटा क्या सरकारी नौकरी के चक्कर में पड़े हो, खेती में अपना भाग्य आजमाओ.
मां की बात हैदर को पसंद आयी अौर उन्होंने खेती शुरू कर दी. अनाज की खेती के साथ ही कीमती पेड़ भी लगाना शुरू किया. हैदर ने बताया कि कीमती पेड़ एक तरह से भविष्य का फिक्स डिपोजिट हैं. यदि बच्ची के जन्म पर पेड़ लगाइए तो शादी के समय काम आता है. बुढ़ापे में पेंशन की तरह भी काम आता है.
इसके साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा व जलावन की समस्या को दूर करता है. हैदर ने बताया कि पेड़ खेतों की मेड़ पर लगाने से खेत में फसल भी उगायी जाती है. हैदर ने महोगनी के 1000 पेड़ लगाये हैं. महोगनी बहुत ही कीमती लकड़ी है, इसके तैयार पेड़ की कीमत 25 से 30 हजार रुपये है. इसके अलावा उन्होंने अर्जुन का 1500 पेड़, पॉपुलर के 2200 पेड़ लगाये हैं. हैदर बताते हैं कि पॉपुलर की पत्तियां ठंड में झड़ कर नीचे गिर जाती हैं, जिससे फसल को धूप भी मिलती है.
गर्मी के मौसम में पत्ती रहने से फसल का बचाव भी होता है. इस पेड़ से फसल को कोई नुकसान नहीं होता है. इसकी लकड़ी से प्लाईवुड, माचिस, फर्नीचर, बैट आदि बनते हैं. अर्जुन की लकड़ी भी काफी कीमती है. इसके भी तैयार पेड़ की कीमत 25 से 30 हजार रुपये तक है. बंदूक का कुंदा भी अर्जुन की लकड़ी से बनता है.
मुफ्त मिलता है पौधा
हैदर ने बताया कि वन विभाग की ओर से सभी पौधा मुफ्त मिलता है.इसके अलावा पौधा लगाने के बाद उसे देख – रेख के लिए भी सरकार एक पेड़ पर 35 रुपये का खर्च देती है. पौधा लगाने के एक वर्ष पूरा होने पर एक जीवित पेड़ पर 10 रुपया, दूसरे साल फिर 10 रुपया और तीसरे साल 15 रुपया दिया जाता है.
संरक्षित करने के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करते हैं पेड़
पेड़ एक तरफ पर्यावरण को सुरक्षित व संरक्षित करते हैं, तो दूसरी तरफ मनुष्य के भविष्य के लिए भी काफी उपयोगी हैं. कई कीमती पेड़ हैं, जो किसानों की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत बना देते हैं. अभी पेड़ लगाने का उपयुक्त समय भी है. वैसे तो पेड़ विभिन्न प्रकार के होते हैं.
सभी के अलग-अलग गुण भी होते हैं. कुछ पेड़ ऐसे हैं, जिन्हें तैयार होने में समय तो लगता है, लेकिन उनकी कीमत किसानों की आर्थिक स्थिति को काफी मजबूत कर देती है. बिहार में जो कीमती पेड़ लगाये जाते हैं, उनमें मुख्य रूप से शीशम, महोगनी, सागवान, जामुन, अर्जुन, गम्हार, चह, महुआ खैर आदि शामिल हैं.शीशम – इसकी लकड़ी का उपयोग लगभग सभी कामों में लाया जाता है. यह 20 से 25 साल में तैयार हो जाता है. एक तैयार अच्छे पेड़ की कीमत 50 हजार रुपये से अधिक होती है. इसे खेत व मेड़ दोनों पर लगाये जाते हैं. मेड़ पर लगाये जाने से फसलों की खेती पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है.
महोगनी काफी कीमती लकड़ी होती है. इसे दो गुणे दो मीटर की दूरी पर लगाया जाता है. यह 25 से 30 साल में तैयार हो होता है. एक पेड़ की कीमत 50 हजार से एक लाख रुपये तक होती है.
सागवान मुख्य रूप से दक्षिण भारत में लगाया जाने वाला पेड़. यह 25 से 30 साल में तैयार होता है. इसके अच्छे पेड़ की कीमत 50 हजार से एक लाख रुपये तक होती है.
दोनों पेड़ों की लकड़ी काफी मजबूत होती है. एक हेक्टेयर में 2500 सौ पेड़ लगाये जा सकते हैं, जिससे पेड़ सीधे ऊपर की ओर जाता है. बाद में धीरे-धीरे कमजोर पेड़ों को हटा दिया जाता है.
यह भी काफी कीमती लकड़ी है. इसकी लकड़ी का उपयोग हर काम में लाया जा सकता है. यह काफी हल्की लकड़ी होती है. इसकी लकड़ी में कीड़े नहीं लगते हैं.
वन विभाग की बेवसाइट पर पेड़ों के बारे में और उसकी उपलब्धता के बारे में भी सभी जानकारी उपलब्ध है. कहां किस नर्सरी में पौधा उपलब्ध है यह भी जानकारी दी गयी है.
सुधीर कुमार, प्रमंडलीय वन पदाधिकारी
समेकित मछलीपालन से बदल सकती है सूरत
आज 500 से अधिक लोगों को दे रहे हैं रोजगार
बंदरा प्रखंड के मतलुपुर के कोरलाहा चंवर में साल के नौ महीने जलजमाव रहता था. किसी-किसी साल मुश्किल से गेहूं की खेती होती थी. किसानों को मालगुजारी का पैसा भी बड़ी मुश्किल से निकलता था. लेकिन, आज वहां पर मछली उत्पादन कर किसान लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं.
नौकरी छोड़ मछली पालन शुरू किया
समस्तीपुर जिले के रोसड़ा निवासी 40 वर्षीय शिवराज सिंह ने 2007 में पश्चिम बंगाल यूनिवर्सिटी व एनिमल एंड फिशरीज यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद 2008 में आंध्रप्रदेश के मल्लोर में नौकरी शुरू की. आरएयू के पूर्व वीसी डॉ गोपाल त्रिवेदी की प्रेरणा से 2013 में मतलुपुर गांव के 22 किसानों से 87 एकड़ जमीन लीज पर लेकर समेकित मछली पालन शुरू किया. प्रोजेक्ट पर चार करोड़ रुपये खर्च हुए. बैंक से 96 लाख रुपये कर्ज भी लिया. दो-तीन साल तक 87 एकड़ में स्थित 23 तालाबों से कुछ भी आमदनी नही हो रही थी.
लेकिन, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. 2016 में उनकी मेहनत रंग लायी व उत्पादन शुरू हुआ. आज वह ‘जॉब सीकर’ की जगह जॉब क्रिएटर बन गये हैं. मछली के साथ-साथ उम्दा किस्म का जीरा उत्पादन भी हो रहा है. ताजी मछलियां तालाब से ही 250 से 300 रुपये किलो बिक जाती हैं. तालाब में जयंती रेहु, इंप्रूव्ड कतला, आमूर कार्प, ग्रास कार्प, नैनी, जासर मछली का पालन होता है.
मौसमी फलों के लगाये हैं पेड़
87 एकड़ में 23 तालाब हैं, जिनका जलक्षेत्र 71 एकड़ है. इसमें 30 एकड़ में मत्स्य बीज का उत्पादन किया जा रहा है. शिवराज ने बताया कि आमूर कार्प जीरा डालने से वह तीन महीने में ही एक किलो वजन का हो जाता है. सात से आठ माह में वह चार किलो तक हो जाता है.
शिवराज ने बताया कि मछली बीज लेने के लिए यहां कैमूर, रोहतास, बांका, भागलपुर, मुंगेर, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, अररिया, सीतामढ़ी आदि जिलों के मछली उत्पादक आते हैं. शिवेंद्र 57 एकड़ जमीन पर बने तालाबों में मछली का उत्पादन करते हैं. तालाबों में पानी की कमी नहीं हो, इसके लिए 100-100 केवीए के दो ट्रांसफॉर्मर, 20 सेलो बोरिंग करायी है. इन तालाबों से 90 से 100 टन मछली का उत्पादन होता है.
तालाब की चारों ओर भिंडा पर विभिन्न प्रकार के पेड़ भी लगाये हैं, जिनमें 200 आंवला, 5000 केला, 500 पोपुलर,1000 गम्हार, 500 कटहल, 50 अनार, 200 कदम, 400 जामुन व 200 मौसमी के पेड़ भी हैं.
बायोफ्लॉक विधि से मछलीपालन से अधिक लाभ
डॉ मो अकलाकुर वैज्ञानिक
क्षेत्रीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र मोतीपुर भी. कृ. अनु. प. – केंद्रीय मत्स्यिकी शिक्षा संस्थान, मुंबई
बिहार के किसान मछली का उत्पादन परंपरागत विधि की अपेक्षा बायोफ्लाॅक विधि से कर 20 से 50 गुना अधिक लाभ कमा सकते हैं. इस विधि से मछली की खेती से प्रति इकाई जमीन पर लाभ अन्य कृषि कार्य की तुलना में 50 से 100 गुना अधिक होगा. इस विधि से मछली पालन कम-से-कम जगह में छोटे-छोटे टेंक बनाकर किया जा सकता है, जिसमें प्रति 20000 लीटर अर्थात 20 घन मीटर पानी से 10 क्विंटल मछली उत्पादन हो सकता है.
इस विधि से गलफड़ से सांस लेने वाली मछली जैसे कॉमन कार्प, रोहू, तिलपिया आदि का 20 से 30 किलो प्रति घनमीटर (1000 ली) तक और हवा में सांस लेने वाली मछली जैसे पंगास और अन्य केट फिश का उत्पादन 50 से 60 किलो प्रति घनमीटर (1000 ली) या अधिक हो सकता है.
बायोफ्लाॅक में आहार
इस विधि में प्रोटीन की उपयोग दक्षता 25% से 50% तक बढ़ जाती है. फ्लॉक खाने वाली मछली को आहार 1% से 1.5% तक देते हैं. यदि मछली फ्लॉक नहीं खाती है तो 2% से 3% तक फीड दिया जा सकता है. किसान हमेशा कम आहार देना शुरू करें और उतना ही खिलाएं जो मछली 30 मिनट में खत्म कर दे. यह राशन फिक्स करने के बाद इसे दो बार प्रति दिन के हिसाब से दें. अधिकतम उतना फीड दे, जिससे कि दो घंटे के बाद एक भी फीड का दाना न बचे और 30 मिनट में मछली 75% दिया गया दाना खा ले.
बायोफ्लॉक विधि में आवश्यक सामग्री
कार्बन स्रोत : मोलासेस (छोआ), अपरिस्कृत गुड़, मैदा, टेपियोका का पाउडर, पानी में नाइट्रीकरण बढ़ाने वाले प्रोबायोटिक, अमोनियम सल्फेट या यूरिया, चूना, सोडा अर्थात सोडियम बाइकार्बोनेट एवं निरंतर ऑक्सीजन यानी हवा का प्रवाह. इस तंत्र के लिए हवा का प्रवाह एवं पानी का नियमित मिश्रण के लिए एरेटर एवं छोटे सबमर्सिबल पंप का उपयोग कर करते है.
पानी गुणवत्ता नियामकों का पूरा ध्यान रखना चाहिए, जैसे की तापमान 25 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच हो. संघुलित ऑक्सीजन 5 मिलीग्राम प्रति लीटर से हमेशा ज्यादा हो, पीएच 7 से 8 और कुल अमोनिया 0.5 पीपीएम से कम. इसी प्रकार नाइट्रायट 5 पीपीएम से कम और नाइट्रेट 150 पीपीएम से कम होना चाहिए. दैनिक पीएच का परिवर्तन कम हो. इसके लिए पानी की क्षारीयता 120 से 250 के बीच रखना चाहिए.
कुल मिलाकर निलंबित ठोस कानो की सांद्रता 400 से 500 इकाई तक अधिक हो तो परिणाम बहुत अच्छा होता है. बायोफ्लॉक सिस्टम में सबसे बड़ी सावधानी यह रखनी चाहिए कि एक घंटा से ज्यादा किसी भी हालत में आक्सीजन बंद नहीं हो. साथ ही आपके पास टीडीएस मीटर या पीएच, 3 ऑक्सीजन एवं अमोनिया मापक किट आपके पास होना चाहिए. प्रतिदिन पीएच, ऑक्सीजन मापना जरूरी होता है.
मछलीपालन के लिए उपयुक्त समय
मौसमी गड्ढे अथवा छोटे तालाबों में जीरा उत्पादन उत्पादन कर सकते हैं. इसे अगर कुछ जरूरी बिंदुओं पर ध्यान दें, तो मुनाफा दोगुना तक बढ़ाया जा सकता है.
डॉ शिवेंद्र कुमार व आरके बह्मचारी
सहायक प्राध्यापक, मत्स्यकी महाविद्यालय, ढोली
तालाबों व मौसमी गड्ढों को कैसे करें तैयार
तालाबों व गड्ढों से खर-पतवार का उन्मुलन : अमूमन इनका उन्मूलन मानव श्रम या खर-पतवार नाशक रसायानों से किया जा सकता है. लेकिन अगर अभी रसायनों का प्रयोग करेगें तो 20–25 दिनों बाद ही तालाब में मछली संचयन किया जाना चाहिए.
अवांक्षित मछलियों का उन्मूलन : तालाबों से अवांछित मछलियां नहीं निकालने पर ये संचयित जीरा या उनके आहारों को खा लेंगी. अवांछित मछलियों का उन्मूलन 250 किलो प्रति हेक्टेयर महुआ की खल्ली के प्रयोग से किया जा सकता है.
लेकिन इसके प्रयोग के बाद कम-से-कम 21 दिनों बाद ही जीरा संचय किया जा सकता है. इसके अलावा 100 किलो ब्लीचिंग पाउडर एवं 100 किलो यूरिया को मिला कर प्रति हेक्टेयर प्रति मीटर पानी में डालने से मछलियां तेजी से मरती हैं व विष का असर 3–5 दिन तक ही रहता है.
जलीय कीड़ों का उन्मूलन : इसके लिए 50 लीटर डीजल का प्रयोग एक हेक्टेयर जलक्षेत्र के लिए किया जा सकता है. यह ध्यान देना चाहिए की डीजल का प्रयोग सुबह या शाम को करें या जब हवा एक दम शांत हो.
चूने का उपयोग : तालाब के अच्छे प्रबंधन में चूने का प्रयोग बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि चूना मछली के प्राकृतिक भोजन और बीमारी उत्पन्न करने वाले जीवों पर प्रभाव डालता है. जीरा उत्पादन वाले तालाबों में बुझा हुआ चूना 200 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जाता है. लेकिन अगर पानी और मिट्टी का पीएच कम हो तो इसकी मात्र बढ़ाई भी जा सकती है. यदि तालाब में ब्लीचिंग पाउडर का प्रयोग किया गया है तो चूना की मात्रा कम कर दी जाती है.
खाद का प्रयोग : जीरा संचयन से एक सप्ताह पूर्व तालाब में 500 किलो केचुए द्वारा उत्पादित खाद या 2000 किलो सड़ा गोबर प्रति हेक्टेयर प्रयोग किया जाता है. साथ ही यूरिया 25 किलो और सिंगल सुपर फास्फेट 50 किलो प्रति हेक्टेयर का प्रयोग भी किया जा सकता है.
जीरा का संचयन वाले तालाब में 50 लाख स्पॉन प्रति हेक्टेयर की दर से संचय किया जाता है. ये स्पाॅन मिश्रित या एक ही प्रजाति के हो सकते है. स्पॉन हमेशा प्रतिरक्षित हैचरी से ही खरीदना चाहिए एवं इनका परिवहन एकदम सुबह अथवा शाम में करना चाहिए.
स्पॉन का पूरक आहार
नर्सरी तालाब में उपलब्ध प्राकृतिक भोजन के अलावा ऊपरी अथवा पूरक आहार देने से मछलियों का विकास अच्छा होता है. साधरणत: इसके लिए सरसो की खली और चावल की भूसी का उपयोग किया जाता है. इसकी बराबर-बराबर मात्रा अच्छी तरह पीसकर कपड़े से छानकर प्रतिदिन दो बराबर भागों में बांटकर सुबह-शाम देना ज्यादा फायदेमंद है. पूरक आहार की मात्रा निम्न तालिका के अनुसार दी जानी चाहिए.
(पूरक आहार की मात्रा एक लाख स्पॉन के लिए)
स्पॉन संचय की अवधि आहार की मात्रा प्रतिदिन
1-5 दिन तक 600 ग्राम
6-10 दिन तक 1200 ग्राम
11-14 दिन तक 1800 ग्राम
1 लाख स्पॉन का वजन लगभग 140 ग्राम होता है. 1-5 दिन तक जीरा के वजन का चार गुना, 6-10 दिन तक आठ गुना आहार दिया जाता है. पूरक आहार में खनिज लवण का मिश्रण एग्रोमीन , पिफशमीन आदि मिलाकर दिया जाये तो जीरे की वृद्धि व उत्तरजीविता अच्छी होती है. अत्यधिक हरा रंग या काई होने पर उर्वरीकरण व आहार देना तुरंत बंद कर देना चाहिए.
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