मुजफ्फरपुर : ऑटो टिपर घोटाले में एमवीआई की जांच रिपोर्ट के बिना ही 1.72 करोड़ से अधिक रकम का भुगतान पटना की मौर्या मोटर्स को कर दिया गया है. इस बात का खुलासा निगरानी एसपी की जांच रिपोर्ट से हुआ है. यहीं नहीं, नियम को ताक पर रख कर तत्कालीन नगर आयुक्त रमेश रंजन ने पटना की एजेंसी को टेंडर दिया था.
निविदा समिति बनाने के समय भी लापरवाही बरती गयी. समिति में संविदा पर बहाल अभियंता को शामिल नहीं करना था. लेकिन रमेश रंजन ने समिति में निविदा पर बहाल इंजीनियर को सदस्य के तौर रखा. ऑटो मोबाइल विशेषज्ञ की जगह सिविल इंजीनियर को भी समिति में शामिल कर लिया. निगरानी एसपी ने रिपोर्ट में जिक्र किया है कि नगर आयुक्त को साढ़े तीन करोड़ का ही टेंडर स्वीकार करने का अधिकार है. लेकिन 3.82 करोड़ की निविदा स्वीकृत कर ली.
यह था मामला
सितंबर 2017 में निगम में ऑटो टिपर सप्लाई करने के लिए टेंडर निकाला गया था. पटना, मुजफ्फरपुर व हरियाणा की एजेंसी ने अलग अलग दर से टेंडर डाला. सबसे कम रेट तिरहुत ऑटो मोबाइल मुजफ्फरपुर का था. उसके बाद भी पटना की एजेंसी को टेंडर दे दिया गया. इसकी शिकायत तिरहुत ऑटो मोबाइल के संजय गोयनका ने निगरानी से की थी. जिसके बाद एसपी सुबोध कुमार विश्वास को जांच की जिम्मेवारी दी गयी थी.
दस पर कार्रवाई की अनुशंसा
रिपोर्ट मेंं 42 दिन के लिए नगर आयुक्त के प्रभार में रहे अपर समाहर्ता रंगनाथ चौधरी पर भी आरोप लगा है. उन्होंने ने ही एमवीआई जांच के लिए फाइल पर लिखा था. उसके बाद भी प्रतिवेदन अप्राप्त होने पर 16 जनवरी को 1.72 करोड़ का भुगतान कर दिया, जबकि उसी दिन नये नगर आयुक्त के पदस्थापन की सूचना जारी हो चुकी थी. जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि उन्हें निगम का रूटीन कार्य करना था न कि नीतिगत निर्णय लेना था. रिपोर्ट में तत्कालीन नगर आयुक्त रमेश रंजन सहित कुल दस लोगोें के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की गयी है. जिसमें छह इंजीनियर है.