आध्यात्मिक वातावररण में भगवान पार्श्वनाथ का बिम्ब प्राण-प्रतिष्ठा सह पंचकल्याण महोत्सव संपन्न

तीर्थंकर पाश्वनाथ भगवान् के गगन भेदी नारों के बीच आचार्य श्री ने मंगल मंत्रोच्चार के बीच मन्दिर के शिखर पर ध्वज स्थापित किया.

निकली भव्य शोभा यात्रा, वेदी पर स्थापित हुए भगवान पार्श्वनाथ मुंगेर मुंगेर में आयोजित भगवान पार्श्वनाथ जिन बिम्ब प्राण प्रतिष्ठा सह पंच कल्याण महोत्सव रविवार को जैन मन्दिर में मूर्ति स्थापना के साथ सम्पन्न हो गया. जैन धर्माचार्य शिरोमणि प्रमुख सागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजन स्थल नगर भवन से बेकापुर स्थित मन्दिर तक भव्य शोभा ध्वज यात्रा निकाली गई, जो नगर के व्यस्ततम चौक चौराहे से होते हुए श्री मन्दिर तक पहुंची. जहां तीर्थंकर पाश्वनाथ भगवान् के गगन भेदी नारों के बीच आचार्य श्री ने मंगल मंत्रोच्चार के बीच मन्दिर के शिखर पर ध्वज स्थापित किया. जैन समाज के उत्साही भक्त एक के बाद एक भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा के पास पहुंच कर उनका अभिषेक किया. मंत्र पाठ तथा जयकारे के बीच भगवान पार्श्वनाथ के साथ अन्य अवतारों की भी पूजा की गई. जिसमें कुंद कुंद स्वामी, भगवान महावीर, वासु पूज्य भगवान, चंद्रप्रभु स्वामी, आदिनाथ स्वामी को विराजमान कर प्राण प्रतिष्ठा की गई. शोभा यात्रा में नर, नारी एवं जैन मुनि संतों ने भाग लिया. यात्रा में ध्वज तथा रथ के साथ बैंड बाजा भी बज रहे थे. जिससे नगर का वातावरण भक्तिमय हो उठा. मुख्य मार्ग के लोगों ने फूलों से यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं का स्वागत किया. इस अवसर पर नगर भवन के प्रशाल में आचार्य श्री ने प्रज्ञा पिता ब्रह्माकुमारी संस्थान की यूनिट हेड जयमाला एवं उनकी सहयोगी बहन सीता का स्वागत किया. इसके अतिरिक्त आयुर्वेदाचार्य डॉ अशोक शर्मा का भी भावभीना अभिनन्दन कर आशीर्वाद दिया. आचार्य श्री ने उपस्थित सभी आमंत्रित जैन श्रद्धालुओं के समर्पण एवं दानशीलता की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहा कि मानव इस धरती पर मुठ्ठी बांधे आता जरूर है, लेकिन हाथ पसारे ही यहां से जाता है. आप जो भी नेक कार्य और सत्कार्य में दान करते हैं मूलतः वह स्वतः सुखाय ही है. क्योंकि आप इस माध्यम से स्वयं के लिए पुण्य अर्जित करते कर स्वयं का आत्म कल्याण करते हो. भाजपा नेता ने राजेश जैन ने कहा कि जैन समुदाय संख्यत्मक दृस्टि कोण से कम जरूर है लेकिन देश के अर्थ व्यवस्था की रीढ़ हैं. मुंगेर के निवासी व मुंबई के जाने माने अक्षर विज्ञानी जैन कमल ने आचार्य श्री से अनुरोध किया कि वो भारत की प्राचीनतम लिपि ब्राहमी लिपि को भारतीय करेंसी में स्थान देने का अनुरोध केंद्र सरकार से करें. पद्म श्री बिमल जैन जी का अभिनन्दन करते हुए आचार्य श्री ने उनकी आँखों में काजल लगाया. कार्यक्रम संयोजक निर्मल जैन आयोजन की सफलता को लेकर भाव विव्हल थे.

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Author: RANA GAURI SHAN

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