पादुका दर्शन स्थित संन्यास पीठ में चातुर्मास अनुष्ठान के तहत चल रहे लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में आध्यात्मिक वातावरण और गहरा हो गया. वैदिक अनुष्ठान, सत्संग और संकीर्तन के बीच परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने भक्ति के वास्तविक स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि भक्ति केवल कोई मार्ग या पद्धति नहीं, बल्कि जीवन और चेतना की ऐसी अवस्था है, जिसमें मनुष्य परम तत्व के साथ जीवंत संबंध स्थापित करता है.
साधना के मार्ग से आगे की अवस्था है भक्ति
स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि परम तत्व तक पहुंचने के लिए साधना के अनेक मार्ग हो सकते हैं. ये मार्ग साधक के लिए सहायक हैं, लेकिन स्वयं भक्ति नहीं हैं. भक्ति इन मार्गों से आगे विकसित होने वाली चेतना की अवस्था है. इसे किसी एक धर्म, संप्रदाय या बाहरी कर्मकांड तक सीमित नहीं किया जा सकता.
अपेक्षाओं से मुक्त होने पर साधना होती है सहज
उन्होंने कहा कि साधना यदि मनुष्य को स्वतंत्र करने के बजाय आग्रह, अपेक्षा और प्रदर्शन से बांधने लगे तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है. भक्ति वह स्थिति है, जिसमें साधक अपेक्षाओं से मुक्त होकर परम के साथ संबंध स्थापित करता है. संतों का सत्संग इस मार्ग को सहज बनाता है और जीवन के संघर्षों के बीच मानसिक शांति तथा संतुलन बनाए रखने में मदद करता है.
साकार और निराकार दोनों रूपों में भक्ति का विस्तार
स्वामी निरंजनानंद ने भक्ति के साकार और निराकार स्वरूप की चर्चा करते हुए कहा कि साकार भक्ति में साधक मूर्ति, रूप या प्रतीक के माध्यम से ईश्वर से संबंध स्थापित करता है. वहीं निराकार साधना अंतर्मन के द्वार खोलकर परम तत्व के अनुभव की ओर ले जाती है. इसके लिए भीतर सजगता और चेतना का विकास जरूरी है.
अलग भाव से पुकारने पर उसी रूप में मिलते हैं ईश्वर
उन्होंने कहा कि गृहस्थ और योगी अपनी जीवन परिस्थितियों के अनुसार भक्ति को समझ सकते हैं, लेकिन इसका मूल उद्देश्य परमात्मा से संबंध स्थापित करना ही है. यशोदा के मातृत्व भाव, सुदामा के सखा भाव, गोपियों के प्रेम भाव और कंस के बैर भाव का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य जिस भाव से ईश्वर को पुकारता है, उसके लिए ईश्वर उसी भाव में उपस्थित होते हैं.
स्वामी सत्यानंद के समर्पण का भी किया उल्लेख
स्वामी निरंजनानंद ने परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के दास भाव और गुरु के प्रति उनके पूर्ण समर्पण का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि भक्ति का सार बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि अंत:करण की शुद्धता, समर्पण और परम के साथ जीवंत संबंध में निहित है.
भजनों पर भावविभोर होकर झूमे श्रद्धालु
महायज्ञ के तीसरे दिन वैदिक अनुष्ठान के बाद संकीर्तन का आयोजन हुआ. ‘हे ईश्वर, हे परमात्मा, अंतर्यामी तुझको प्रणाम’ समेत विभिन्न भजनों से पूरा संन्यास पीठ परिसर भक्तिमय हो उठा. ‘बोलो जय सत्यानंद’ और ‘गुरुवर सत्यानंद, जीवन बने योग, विश्व बने परिवार’ जैसे भजनों पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूमते नजर आए.
ज्ञान, दया और करुणा से जीवन भरने का लिया संकल्प
संकीर्तन के दौरान श्रद्धालुओं ने ज्ञान, दया, क्षमा और करुणा से जीवन को भरने तथा अहंकार और मोह से मुक्त होकर साधना में लीन होने का संकल्प लिया. इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान के साथ भक्ति के दार्शनिक पक्ष पर भी गंभीर विमर्श हुआ. स्वामी निरंजनानंद का संदेश रहा कि अपेक्षारहित प्रेम, अंत:करण की शुद्धता और सजग चेतना ही भक्ति को जीवन का वास्तविक अनुभव बनाती है.
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