मुंगेर को मॉडल अस्पताल तो मिला, लेकिन प्रारंभ नहीं हो पाया ट्रामा सेंटर

अलग कई मामलों में रेफर किये जाने के दौरान ही मरीजों की मौत हो गयी है.

– दुर्घटना व मारपीट सहित गनशॉट के अधिकांश मामलों में रेफर हो रहे मरीज

– गरीबों के पास प्राइवेट में इलाज के पैसे नहीं, बिना ट्रामा सेंटर के जान गंवा रहे लोग- 6 माह में आये ट्रामा के 593 मामलों में 123 रेफर, 18 मौत

मुंगेर

मुंगेर के लोगों के लिये स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल न माया मिली, न राम वाली हो गयी है. 5 फरवरी 2025 को जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुंगेर सदर अस्पताल में 100 बेड के मॉडल अस्पताल का उद्घाटन किया था तो लोगों को लगा था कि अब यहां सुविधाएं बढ़ने के साथ लोगों को ट्रामा जैसे मामलों में भी विशेष उपचार की सुविधा मिलेगी. लेकिन मुंगेर के लोगों को मॉडल अस्पताल तो मिल गया, लेकिन अबतक यहां के लोगों को ट्रामा सेंटर नहीं मिल पाया है. जिसके कारण दुर्घटना व मारपीट सहित गनशॉट के अधिकांश मामलों में मरीजों को अस्पताल से अबतक रेफर ही किया जा रहा है. इसका अंदाजा केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते 6 माह में सदर अस्पताल में ट्रामा के 593 मामलों में 123 घायलों को रेफर कर दिया गया. जबकि 18 घायलों की मौत हो गयी.

छह माह में ट्रामा के 593 मामलों में 123 रेफर, 18 मौत

सदर अस्पताल में मई से अक्तूबर के 6 माह में मारपीट, गन शॉट सहित हेड इंज्यूरी के कुल 593 मामले आये. जिसमें 123 मामलों में घायलों को रेफर कर दिया गया है. जबकि इस दौरान 18 मरीज सही समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं. इतना ही नहीं इन 6 माह में आरटीए (सड़क दुर्घटना) के कुल 233 मामले सदर अस्पताल में आये. जिसमें से 108 मामलों में घायलों को रेफर कर दिया गया. जबकि 10 मामलों में घायलों की मौत सदर अस्पताल में इलाज के दौरान हो गयी. अब यह तो केवल सरकारी आंकड़ा है. जबकि इससे अलग कई मामलों में रेफर किये जाने के दौरान ही मरीजों की मौत हो गयी है. जिसका कोई आंकड़ा तक अस्पताल के पास नहीं है. जिसे शायद ट्रामा सेंटर होने और सही समय पर इलाज मिलने से बचाया जा सकता था. अब ऐसे में मुंगेर जैसे जिले में जहां आये दिन मारपीट और सड़क दुर्घटना के मामले आते हैं. वहां ट्रामा के इन मरीजों का इलाज कैसे होगा.

न मिला ट्रामा सेंटर, न ट्राएज की सुविधा

32.5 करोड़ की लागत से बने मॉडल अस्पताल का उद्घाटन 5 फरवरी 2025 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया. वहीं इसमें लगभग अस्पताल के सभी वार्डों को शिफ्ट कर दिया गया है, लेकिन अबतक यहां ट्रामा वार्ड चालू नहीं हो पाया है. बता दें कि मॉडल अस्पताल में बने इमरजेंसी वार्ड में ट्राएज वार्ड की सुविधा भी दी गयी है. जिसके लिये अलग-अलग बेड लगाये गये है. इतना ही नहीं इस ट्राएज वार्ड में अलग से ऑपरेशन कक्ष की सुविधा भी है, लेकिन उद्घाटन के 10 माह बाद भी अबतक ट्राएज वार्ड में लगे बेड को जहां मरीजों का इंतजार है. वहीं यहां बना ऑपरेशन कक्ष अबतक बंद पड़ा है.

कहते हैं अस्पताल उपाधीक्षक

सदर अस्पताल उपाधीक्षक डॉ निरंजन कुमार ने कहा कि मुख्यत ट्रामा सेंटर हाइवे किनारे बनाया जाता है. हलांकि सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में ट्राएज की सुविधा होनी है, लेकिन कर्मियों की कमी के कारण इसे अबतक आरंभ नहीं किया गया है.

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क्या होता है ट्राएज वार्डमुंगेर : ट्राइएज एक ऐसी प्रणाली है. जो मरीजों की चिकित्सा स्थिति की गंभीरता के आधार पर उनकी देखभाल को प्राथमिकता देती है, ताकि सबसे गंभीर मामलों का इलाज पहले किया जा सके. इसका उद्देश्य तत्काल जान बचाने वाले रोगियों की पहचान करना, उन्हें सही देखभाल क्षेत्रों में नियुक्त करना और आवश्यकतानुसार निदान/उपचार शुरू करना है. यह सुविधा अक्सर अस्पतालों के आपातकालीन कक्षों और बड़ी दुर्घटनाओं जैसी घटनाओं में उपयोग की जाती है. जहां सभी का तुरंत इलाज करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते हैं. इसमें लाल, हरा और पीला रंग का अलग-अलग बेड जोन होता है. जहां गंभीरता के अनुरूप मरीजों को रखा जाता है.

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Author: RANA GAURI SHAN

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