Motihari News: बुधवार की शाम आई तेज आंधी और बारिश ने पूर्वी चंपारण में जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया. पेड़ टूटकर सड़कों पर गिर गए और कई जगह लकड़ियां बिखर गईं. लेकिन इसी बीच गांधी मैदान और समाहरणालय परिसर के आसपास एक मार्मिक तस्वीर सामने आई, जहां छोटे-छोटे बच्चे भीगी लकड़ियां बटोरते नजर आए.
बारिश थमने के बाद जहां लोग अपने घरों में लौट गए, वहीं ये नौनिहाल टहनियां चुनकर उन्हें एक जगह इकट्ठा करते दिखे. फिर लकड़ी के गट्ठर बनाकर सिर पर उठाते हुए वे समाहरणालय गेट की ओर जाते नजर आए. इन बच्चों के चेहरों पर खेल-कूद की जगह रोजी-रोटी की चिंता साफ झलक रही थी.
पढ़ाई की उम्र में जिम्मेदारी का बोझ
शहर के एक ओर जहां बच्चे स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चे अपने परिवार के चूल्हे की लकड़ी जुटाने में लगे हैं. यह दृश्य सामाजिक और आर्थिक असमानता को उजागर करता है, जो विकास की हकीकत पर सवाल खड़ा करता है.
सवालों के घेरे में बचपन और योजनाएं
यह स्थिति कई सवाल छोड़ती है कि क्या ये बच्चे शिक्षा से वंचित हैं और क्या सरकारी योजनाओं का लाभ इन्हें मिल पा रहा है. पूर्वी चंपारण के 28 प्रखंडों में लगभग 6 हजार आंगनबाड़ी केंद्र हैं, जिनका उद्देश्य बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देना है, लेकिन जमीनी तस्वीर कुछ और ही बयां करती है.
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मोतिहारी से सामंत कुमार गौतम की रिपोर्ट
