कुशी अमावस्या पर क्यों तोड़ी जाती है कुश? जानें पूजा-पाठ में इसका महत्व

कुशी अमावस्या 11 सितंबर को है. इस दिन कुश ग्रहण करने की धार्मिक परंपरा है. जानिए अमावस्या की तिथि, कुश का धार्मिक महत्व और कुश तोड़ते समय किन बातों का ध्यान रखने की मान्यता है.

कुशी अमावस्या इस वर्ष 11 सितंबर को मनाई जाएगी. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधिवत मंत्रोच्चार के साथ कुश ग्रहण करने की परंपरा है. पूजा-पाठ, श्राद्ध कर्म, तर्पण, हवन-यज्ञ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में कुश का विशेष महत्व माना गया है. मान्यता है कि इस दिन ग्रहण की गयी कुश का इस्तेमाल पूरे साल धार्मिक कार्यों में किया जा सकता है. इसी वजह से कई परिवार और पुरोहित इस अवसर पर सालभर के लिए कुश एकत्र करते हैं.

11 सितंबर को कुशी अमावस्या

हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष कुशी अमावस्या 11 सितंबर को है. अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह 10 बजकर 34 मिनट से शुरू होकर 11 सितंबर को सुबह 8 बजकर 58 मिनट तक रहेगी. भाद्रपद मास की इस अमावस्या को कुशोत्पाटिनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है.

धार्मिक परंपरा में इस दिन कुश को विधिपूर्वक भूमि से ग्रहण करने का विधान बताया गया है. इसे धार्मिक कार्यों के लिए पूरे वर्ष सुरक्षित रखने की परंपरा कई जगहों पर देखने को मिलती है.

पूजा-पाठ में क्यों जरूरी मानी जाती है कुश?

हिंदू धर्म में कुश को पवित्र और शुभ माना गया है. धार्मिक अनुष्ठानों में इसकी उपयोगिता लंबे समय से बतायी जाती रही है. संकल्प लेते समय हाथ में कुश धारण करने के साथ तर्पण, श्राद्ध और पूजा-पाठ में भी इसके इस्तेमाल की परंपरा है.

यज्ञ और दूसरे वैदिक अनुष्ठानों में भी कुश का उपयोग किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुश को पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है. तुलसी की तरह ही इसे भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वनस्पति माना गया है.

कुशोत्पाटिनी नाम क्यों पड़ा?

कुशी अमावस्या को कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहे जाने के पीछे कुश को भूमि से निकालने या ग्रहण करने की परंपरा जुड़ी है. मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक ग्रहण की गयी कुश को सालभर धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

इसी कारण इस दिन कई लोग धार्मिक अनुष्ठानों और पितृ कर्म के लिए कुश एकत्र करते हैं. खासकर पुरोहितों और कर्मकांड से जुड़े परिवारों में इस परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है.

कुश तोड़ते समय किन बातों का रखें ध्यान

धार्मिक परंपरा के अनुसार कुश को मनमाने तरीके से किसी भी स्थान से नहीं तोड़ना चाहिए. इसके लिए साफ और शुद्ध स्थान का चयन करने की बात कही जाती है. गंदे स्थान, रास्ते या ऐसी जगह उगी कुश को धार्मिक उपयोग के लिए नहीं लेने की परंपरा है.

कुश को सम्मानपूर्वक ग्रहण करने की बात धार्मिक मान्यताओं में कही गयी है. कुछ परंपराओं में कुश ग्रहण करते समय विशेष मंत्र के उच्चारण का भी उल्लेख मिलता है. इस संबंध में स्थानीय पुरोहित या परिवार की परंपरा के अनुसार विधि का पालन करना उचित माना जाता है.

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