मधुबनी. जिले को फाइलेरिया मुक्त बनाने के लिए मुख्यालय सहित चार प्रखंडों में स्वास्थ्य विभाग की ओर से संचालित नाइट बल्ड सर्वे का काम पूरा हो गया है. जारी रिपोर्ट के अनुसार नाइट ब्लड सर्वे में 11 मरीजों को चिह्नित किया गया है. जिसमें से जिला मुख्यालय में माइक्रो फाइलेरिया के 9 मरीज चिन्हित किया गये हैं. इसमें सबसे अधिक निगम क्षेत्र के भच्छी में 7 तथा बड़ी बाजार में 2 मरीजों को चिह्नित किया गया है. स्वास्थ्य विभाग की ओर से जिला मुख्यालय के अलावे पंडौल, बेनीपट्टी एवं बिस्फी में नाइट ब्लड सर्वे आयोजित किया गया था. इसके तहत एक रेंडम व एक फिक्स साइट बनाया गया था. प्रत्येक सत्र स्थल पर रात 8:30 से 12 बजे तक लोगों का रक्त नमूना एकत्रित किया गया था. प्रत्येक सत्र स्थल पर 300 लोगों का रक्त नमूना लिया गया था. स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार शहर के भच्छी में सबसे अधिक 7 फाइलेरिया मरीजों की पहचान की गई है. जिसका माइक्रो फाइलेरिया दर 2. 33 प्रतिशत है. वहीं शहर के सेंटिनल साइट बड़ी बाजार में 2 फाइलेरिया मरीज चिन्हित किये गये हैं. इसके अलावे पंडौल प्रखंड में 2 बेनीपट्टी, बिस्फी एवं रहिका प्रखंडों में नाइट ब्लड सर्वे एक भी फाइलेरिया मरीज चिन्हित नहीं हुआ है. जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारी डॉ. डीएस सिंह ने कहा कि फाइलेरिया मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारी है. इसके शिकार आगे चलकर दिव्यांग भी हो सकता है. आंकड़े की मानें तो कुल दिव्यांगता का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा फाइलेरिया के कारण होता है. इसलिए इससे बचना बहुत जरूरी है. क्यों आवश्यक है नाइट ब्लड सर्वे डॉक्टर डीएस सिंह ने बताया कि फाइलेरिया को चिन्हित करने के लिए सबसे सटीक विधा एनबीएस है. नाइट ब्लड सर्वे से पता चलता है कि फाइलेरिया बीमारी का प्रसार कितना है और नया मामला कहां मिल रहा है. यह फाइलेरिया उन्मूलन के लिए रणनीति बनाने में सहायक होता है. यह सर्वेक्षण फाइलेरिया से संक्रमित व्यक्तियों की पहचान करने में मदद करती है. उन्होंने कहा यह बीमारी फाइलेरिया क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होता है. जिसमें मच्छर एक धागे के समान परजीवी को छोड़ता है और वह परजीवी हमारे शरीर में प्रवेश कर जाता है. इस बीमारी का लक्षण 10 से 12 वर्षों के बाद दिखाई देता है. इस बीमारी की पहचान के लिए रात में ब्लड सैंपल लेकर जांच की जाती है. क्योंकि रात में शरीर में मौजूद परजीवी सक्रिय हो जाते हैं. सैंपल के माध्यम से लोगों में मौजूद परजीवी की जांच की जाती है. इसकी पहचान शुरुआत में होने पर स्वास्थ्य विभाग द्वारा दवा दी जाती है. इससे व्यक्ति फाइलेरिया संक्रमित होने से बच जाता है. फाइलेरिया की वजह से होने वाले हाथी पांव का कोई इलाज नहीं वीडीसीओ डिंपू कुमार ने फाइलेरिया के संबंध में बताया कि यह एक गंभीर कष्टकारी रोग है. फाइलेरिया की वजह से हाथी पांव होने की स्थिति में इसका इलाज नहीं है. संक्रमण के खतरे से बचाव के लिये सरकार की ओर से हर साल सर्वजन दवा सेवन कार्यक्रम संचालित किया जाता है. लगातार 5 वर्षों तक साल में एक बार दवा का सेवन करने से फाइलेरिया होने की संभावना नहीं रहती है.
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