Madhubani News : हनुमान जयंती मनाने उमड़े श्रद्धालु

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को हनुमान जी के जन्म की बातें कई धार्मिक पुस्तक में लिखी गयी है.

मधुबनी. कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को हनुमान जी के जन्म की बातें कई धार्मिक पुस्तक में लिखी गयी है. कथाओं के अनुसार, इसी दिन हनुमान का जन्म माता अंजनी के गर्भ से हुआ था. रविवार को जिला मुख्यालय सहित ग्रामीण क्षेत्रों में हर्षोल्लास से हनुमान की की गयी. स्टेशन चौक स्थित हनुमान प्रेम मंदिर में हनुमान जन्मोत्सव मनायी गयी. इस अवसर पर हनुमान को 56 भोग लगाया गया. मंदिर के पुजारी पं. पंकज झा शास्त्री ने कहा कि वायु पुराण के अनुसार, हनुमानजी का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चतुर्दशी तिथि को हुआ था. जब सूर्य मंगलवार को स्वाति नक्षत्र व मेष लग्न में था. शिव के अंश के रूप में हनुमानजी का अवतार है. इस दिन हनुमानजी का पूजन, हवन व पाठ स्तोत्र संकीर्तन करने से विशेष लाभ मिलता है. यह दिन भक्ति का प्रतीक है. हनुमानजी की पूजा से सुख, समृद्धि व सफलता की प्राप्त होती है. मंदिर में हनुमानजी कि प्रतिमा एक ही जगह दो है, जो दक्षिण मुख स्थापित है. इस मुख का विशेष महत्त्व होता है. रामजी के अधिकतर कार्य हनुमानजी ने दक्षिण दिशा में ही किये है. दक्षिण दिशा काल यानी यमराज की दिशा मानी जाती है. हनुमानजी रुद्र यानी शिवजी के अवतार हैं, जो काल के नियंत्रक हैं. इसलिए दक्षिणा मुखी हनुमान की पूजा करने पर मृत्यु भय व चिंताओं से मुक्ति मिलती है. इस दिन यम दीप भी जलाया जाता है. यम दीप यमराज को समर्पित कर जलाया जाता है. इसलिए इसकी सही दिशा दक्षिण दिशा मानी जाती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिशा को यम की दिशा माना गया है. दीपावली से एक दिन पूर्व इस दिशा में दीपक जलाने से यमराज की कुदृष्टि नहीं पड़ती और अकाल मृत्यु से रक्षा दक्षिण मुख हनुमान जी करते है.हनुमान जी को सभी ग्रहों के स्वामी के रूप में देखा जाता है, लेकिन मुख्य रूप से उनका संबंध शनि, राहु और केतु जैसे ग्रहों से है. शनि देव हनुमान जी के भक्तों से डरते हैं, जबकि राहु और केतु को भी हनुमान जी की पूजा से नियंत्रित किया जा सकता है. इसलिए, हनुमान जी की पूजा करने से इन ग्रहों से होने वाली नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है और सभी ग्रहों का शुभ प्रभाव प्राप्त किया जा सकता है. हनुमान जी को “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता ” कहा जाता है. माता सीता ने उन्हें वरदान दिया था कि वे आठ प्रकार की सिद्धियों और नौ प्रकार की निधियों को प्राप्त कर सकते हैं. ये सिद्धियां और निधियां अलौकिक शक्तियां और संपदाएं हैं जो उन्हें अतुलनीय बनाती हैं, और वे इन शक्तियों को अपने भक्तों को प्रदान कर सकते हैं.

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Author: GAJENDRA KUMAR

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