रहमत से मगफिरत की ओर बढ़ा रमजान का सफर, गुनाहों की माफी की दुआओं का दौर शुरू उदाकिशुनगंज. बंदों पर रहमत की बारिश करने वाला माहे रमजान का पहला अशरा शनिवार को खत्म हो गया. मुकद्दस महीने रमजान में रोजेदारों पर शुरुआत के 10 रोजे में अल्लाह की खूब रहमत बरसी. शनिवार के शाम रमजान महीने का पहला अशरा खत्म होते ही रविवार से दूसरे अशरे की शुरुआत हो चुकी है. रोजेदार इन दिनों इबादत, तिलावत-ए-कुरआन, तरावीह की नमाज और दुआ में अधिक समय दे रहे हैं. मस्जिदों में विशेष नमाज और तकरीर का सिलसिला जारी है. रमजान के पवित्र माह में मुस्लिम क्षेत्र का माहौल पूरी तरह इबादत और परहेजगारी से सराबोर है. दूसरे अशरे में रोजेदार मगफिरत के लिए अल्लाह से दुआ मांगेगे. क्योंकि रमजान का दूसरा अशरा मगफिरत का है. मान्यता है कि इसमें अल्लाह मरहूमों पर मगफिरत फरमाता है और रोजेदारों को गुनाहों से आजादी मिलती है. सिंगारपुर जामा मस्जिद में रोजेदारों के बीच तकरीर फरमा रहे मौलाना इस्माइल सिद्दीकी ने बताया कि रमजान माह के दूसरे असरे को मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का अशरा कहा जाता है. इसमें अल्लाह अपने बंदों को खास खास इनआमात से नवाजता है. तीन अलग-अलग अशरों में होता है रमजान उन्होंने बताया कि माहे रमजान में अल्लाह ताला अपने बंदों को रहमतों से जहां मालामाल करता है वहीं उसे गुनाहों से नजात व जहन्नम से आजादी देता है. इसके लिए रमजान को तीन अलग-अलग अशरों (भाग) में बांटा गया है. पहला अशरा रहमत का होता है. जो रमजान के चांद से शुरू होकर दसवें रोजे तक जारी रहता है. दूसरा अशरा मगफिरत (क्षमा) का है. इस अशरे में इंसान को अपने रब से गुनाहों की मगफिरत के लिए दुआ करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि इसी तरह आखिरी अशरा जहन्नम से नजात दिलाने वाला होता है. जो बेहद अहम माना जाता है. उन्होंने बताया कि आखिरी अशरे तक रोजा व इबादत का सिलसिला कायम रखना बड़ी बात होती है. यही वजह है कि आखिरी अशरे में इबादत करने वालों को अल्लाह ताला इनाम के तौर पर जहन्नम से नजात यानी मुक्ति देने का वादा किया है.
रमजान का पहला अशरा खत्म, ग्यारहवें रोजे से दूसरा अशरा शुरू
बंदों पर रहमत की बारिश करने वाला माहे रमजान का पहला अशरा शनिवार को खत्म हो गया. मुकद्दस महीने रमजान में रोजेदारों पर शुरुआत के 10 रोजे में अल्लाह की खूब रहमत बरसी.
