हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी विभाग की ओर से ‘हिंदी भाषा का महत्व और चुनौतियां’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में वक्ताओं ने हिंदी को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एकता, स्वाभिमान और भारतीय संस्कृति की पहचान बताया. वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल दौर में हिंदी को रोजगार से जोड़ना जरूरी है, ताकि नई पीढ़ी भाषा से और मजबूती से जुड़ सके.
डिजिटल दौर में हिंदी को रोजगार की भाषा बनाने की जरूरत
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए डॉ. प्रियंका कुमारी ने कहा कि हिंदी के महत्व को समझना जरूरी है. डिजिटल दौर में हिंदी को रोजगार की भाषा बनाना समय की मांग है. उन्होंने कहा कि हिंदी को रोजगार के अवसरों से जोड़ने पर युवा इससे अधिक संख्या में जुड़ेंगे.
बदलते समय के साथ हिंदी में हो रहा बदलाव
डॉ. सत्येंद्र कुमार ने कहा कि हिंदी निरंतर विकास की ओर अग्रसर है और बदलते समय के साथ नए बदलावों को आत्मसात करने में सक्षम है. उन्होंने कहा कि भाषाओं के बीच टकराव नहीं होना चाहिए. सभी भाषाओं का सम्मान जरूरी है. उनके अनुसार हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है.
एआई के दौर में भाषा की भूमिका हुई महत्वपूर्ण
विशिष्ट वक्ता डॉ. प्रफुल्ल कुमार ने हिंदी की उत्पत्ति और विकास पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि हिंदी की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि वह दूसरी भाषाओं और शब्दों को आत्मसात करती है. उन्होंने कहा कि समय के साथ बदलाव जरूरी है, क्योंकि बदलाव से दूर रहने पर विकास की दौड़ में पीछे छूटने का खतरा रहता है.
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में सुविधाजीविता का भाव बढ़ रहा है और युवा सीधी-सरल चीजों को जल्दी ग्रहण करना चाहते हैं. एआई के दौर में भाषा की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है, वहीं चुनौतियां भी बढ़ी हैं. भाषाएं मनुष्य को विवेक प्रदान करती हैं और तकनीक के उपयोग का सामर्थ्य देती हैं. उन्होंने कहा कि विज्ञान जिन चीजों को छोड़ देता है, भाषा उन्हें पोषित करती है. विश्व में हिंदी बोलने वालों की बड़ी संख्या को उन्होंने हिंदी की महत्वपूर्ण ताकत बताया.
हिंदी को बताया संघर्ष और स्वाभिमान की भाषा
मुख्य वक्ता प्रो. सिद्धेश्वर कश्यप ने कहा कि हिंदी बोलियों का समूह और गंगा-जमुनी तहजीब की भाषा है. उन्होंने कहा कि रूप बदलने के साथ हिंदी निखरती जाती है. निज भाषा के बिना मनुष्य की संवेदना जीवित नहीं रह सकती. हिंदी संघर्ष, स्वाभिमान और अखंडता की भाषा है.
उन्होंने कहा कि हिंदी की उपेक्षा टेक्नोक्रेट और ब्यूरोक्रेट स्तर पर भी देखने को मिलती है. भाषाई पृथकतावाद और अंग्रेजियत से मुक्ति की आवश्यकता है.
अंग्रेजी सशक्त बनाती है, हिंदी जमीन से जोड़ती है
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रधानाचार्य प्रो. संजीव कुमार ने कहा कि हिंदी एक समुद्र के समान है, जिसमें भारत की विभिन्न भाषाएं समाहित होती हैं. उन्होंने कहा कि अंग्रेजी हमें सशक्त बनाती है, लेकिन हिंदी हमें अपनी जमीन और संस्कृति से जोड़े रखती है.
कार्यक्रम के अंत में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शेफालिका शेखर ने धन्यवाद ज्ञापित किया. मंच संचालन कुमारी अनामिका ने किया.
