मधेपुरा : जिले के किसान सूखे की मार से कराह रहे हैं. प्रकृति, नहर, नलकूप के साथ नहीं देने की वजह से धान के फसल की पटवन नहीं कर पाने के कारण सूख जा रही है. जिले के अधिकांश प्रखंड की यही स्थिति है. सरकारी नलकूप जहां शोभा की वस्तु बनी हुई है. वहीं नहरों में पानी नहीं आ रहा है. पंपसेट से पटवन करना महंगा है. उस पर से डीजल अनुदान के लिए सरकार की नीति कोर्ट में खाज का काम कर रही है.
जिले में सूखे की मार से कराह रहे किसान
मधेपुरा : जिले के किसान सूखे की मार से कराह रहे हैं. प्रकृति, नहर, नलकूप के साथ नहीं देने की वजह से धान के फसल की पटवन नहीं कर पाने के कारण सूख जा रही है. जिले के अधिकांश प्रखंड की यही स्थिति है. सरकारी नलकूप जहां शोभा की वस्तु बनी हुई है. वहीं नहरों […]

ग्वालपाड़ा प्रतिनिधि के अनुसार, प्रखंड क्षेत्र में कम बारिश होने का प्रतिकूल असर धान की फसल पर देखा जा रहा है. बारिश के अभाव में धान का पौधा पीला पर गया है. किसानों के लिए सिंचाई एक चुनौती बनी हुई है. प्रखंड क्षेत्र में लगाया गया सरकारी नलकूप जहां शोभा कि वस्तु वन कर रह गयी है.
वहीं सिंदुवारी से नोहर, ग्वालपाड़ा , राजपुर सरसंडी होकर गुजरने वाली नहर में 25 से 30 वर्षों के अंतराल में किसानों को पानी देखना सपना हो गया है. वैसे नहर मरम्मती के नाम पर सालों साल करोड़ों का खर्च होता है, लेकिन सिंचाई के लिए एक बूंद भी पानी नसीब नहीं होता है.
वैसे किसान अपनी धान की फसल को बचाने के लिए निजी पंपसेटों से लगातार ऊंची कीमत चुका कर पटवन कर रहे है, लेकिन इससे बहुत लाभ दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है. डीजल अनुदान दिया जा रहा है, लेकिन उसकी प्रक्रिया इतनी जटिल कर दी गयी है कि सभी किसानों के लिए ये लाभ लेना नामुमकिन साबित हो रहा है. किसान संतोष झा कहते हैं कि आज के समय में किसान हायब्रीड धान की फसल लगाते हैं. जिसका समय सीमा निर्धारित है.
इस मौसम में बारिश की कमी के कारण धान का पौधा पीला पड़ने लगा. कीड़े-मकोड़े का प्रकोप बढ़ गया है. इससे धान की पैदावार पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना है. प्रभारी बीएओ के अनुसार प्रखंड क्षेत्र में 5930 हेक्टेयर में धान लगाने का निर्धारित लक्ष्य था. जिसे लगभग पूरा कर लिया गया है तथा उत्पादन लक्ष्य 20016 मैट्रिक टन निर्धारित की गयी है, जिसे पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है.
शंकरपुर प्रतिनिधि के अनुसार, खरीफ फसल लगने के बाद औसत से कम हो रहे बारिश के कारण धान के पौधे विभिन्न प्रकार के रोग व कीड़े मकोड़े के शिकार हो कर धान के फसल बर्बादी के कगार पर पहुंच गये है.
मालूम हो कि प्रखंड क्षेत्र के हजारों एकड़ में किसान उन्नत प्रजाति के धान की फसल लगाये हुये है, लेकिन बारिश औसत से कम होने के कारण किसान अपने धान के फसल को बचाने के लिए दिन रात एक कर पंपसेट से धान के फसल में पानी लगाने में लगे हुये है, लेकिन सूर्य भगवान के उगलते आग के सामने पंप सेट से दिये जा रहे पानी नाकाफी साबित हो रहा है. बारिश नहीं होने के कारण धान के पौधे कई तरह के रोग से प्रभावित हो गया है. जबकि इस समय अधिकांश धान के पौधे में बाली निकलना शुरू हो गया है.
मौसम का यही रूख रहा तो किसानों को अपने फसल के एक अच्छी पैदावार होने के देख रहे सपना ही बनकर रह सकता है और किसान कर्ज के नीचे दबकर रह जायेंगे. किसान शिवशंकर मेहता, वीरेंद्र मेहता, जयकुमार मेहता, गजेंद्र यादव आदि ने बताया कि मौसम के बिगड़ते हालात से सुखार जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है. धान की खेती करने के लिए किसान को कर्ज का सहारा लेना पड़ता है.
अब मौसम की मार से धान की अच्छी पैदावार होने की असार खत्म हो रही है. धान के पौधे में अब बाली निकलने का समय आ गया है. इस समय चल रही हवा धान के फसल को नुकसान पहुंचा रहा. सरकार को इस क्षेत्र को सुखार क्षेत्र घोषित कर देना चाहिए व किसान को सहयोग राशि उपलब्ध कराना चाहिए. ताकि किसान कर्ज के बोझ से निकल सके प्रखंड क्षेत्र में सरकारी स्तर पर कही नहीं चल रहा.
नलकूप व माइनर : प्रखंड क्षेत्र में कही भी नलकूप की व्यवस्था नहीं है. प्रखंड के अधिकांश नहर में पानी बहाव विभागीय उदासीनता के कारण नहीं हो पाती है. इस वजह से नहर होते हुए भी किसान के खेत नहर के पानी से पटवन नहीं हो पाता है.
उदाकिशुनगंज प्रतिनिधि के अनुसार, प्रखंड क्षेत्र में बारिश कम होने से किसान पूरी तरह से हलकान है. सैकड़ों एकड़ में लगी धान की फसल सूखने लगी है. भादो के महीने में भी किसानों के खेत सूखे पड़े हैं. किसान पंपिंग सेट के सहारे फसल बचाने की हर संभव कोशिश कर रहे है. खेतों में पीले पड़े बीमार धान के पौधे देख किसानों के हलक सूख रहे हैं. कम बारिश का असर धान की फसल पर पड़ रहा.
धान की खेती के लिए जाना जाने वाला यह क्षेत्र गरमा धान व अगहनी धान की उपज के लिए मशहूर था. क्षेत्र के कई छोटे किसान धान की फसल बर्बाद होता देख रोजी रोजगार के लिए पलायन करने पर भी विवश हो रहे हैं. ऐसे किसानों का कहना है की कर्ज लेकर किसी तरह खेती करते है. थोड़ी बहुत मदद बारिश से हो जाती थी तो पटवन का खर्च बच जाता था पर महंगे डीजल खरीद रोज पटवन कर धान की खेती में बचत नहीं होगी.
समय पर बारिश नहीं होने के कारण धान की फसल बर्बाद
मुरलीगंज : प्रखंड के जोरगामा, कोल्हायपट्टी, नाढी, पड़वा नवटोल, पोखरण परमानंदपुर, रघुनाथपुर, रजनी, रामपुर, सिंगियान, दिग्गी, गंगापुर, हरिपुर कला, बेलो आदि में धान की फसल कीड़े लगने व सुखार के कारण बर्बाद हो रही है.
कुछ नहरों के किनारे के खेतों की बात छोड़ कर इस बार किसानों की मानें तो 30 से 40 फीसदी नुकसान धान में हुआ है. गंगापुर पंचायत के किसान ने बताया कि बारिश नहीं होने से खेत में धान की फसल में कई तरह के रोग व धान के पौधों में प्रजनन की क्रिया होनी चाहिए, वह नहीं हो पाई. प्रखंड में बारिश कम होने से किसान पूरी तरह हलकान हैं. सैकड़ों एकड़ में लगी फसल सूखने लगी है. सावन के महीने में खेतों सूखे पड़े हैं.
किसान पंपसेट के सहारे फसल को बचाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. खेतों में पीले पड़े धान बीमार धान के पौधे देखकर किसान के हलक सूख रहे हैं. शुरूआत में एक-दो दिन इतनी बारिश हो गयी, जिससे सरकार यह अनुमान लगा रही है कि जितनी बारिश होनी चाहिए थी वह हो चुकी बाद में कम बारिश का असर धान की फसल पर पड़ा.
धान की खेती के लिए जाने वाला या क्षेत्र गरमा धान अग्नि धान की उपज के लिए मशहूर था. इस क्षेत्र के कई छोटे किसान धान की फसल बर्बाद होता देख रोजी रोटी के लिए पलायन करने को विवश हैं. ऐसे में किसानों का कहना है कि कर्ज लेकर किसी तरह खेती करते हैं.
थोड़ी बहुत मदद बारिश से हो जाती थी तो पटवन का खर्च बढ़ जाता था. महंगे डीजल खरीद कर रोज पटवन कर धन की बचत नहीं होगी. गंगापुर के पूर्व सरपंच योगेंद्र यादव का 15 बीघा धान की फसल लगभग बर्बादी के कगार पर ही है. जय नारायण यादव, प्रमोद यादव, संत कुमार यादव का धान सुख चुका है. अरविंद कुमार, विष्णुदेव यादव, नरेश यादव, अप्पू कुमार, मनोज कुमार, अजय यादव हताश व निराश है.
सिंहेश्वर प्रखंड में सिंचाई परियोजना नगण्य, किसान परेशान, िवभागीय अधिकारी बेखबर
सिंहेश्वर. प्रखंड क्षेत्र में सिंचाई परियोजना नगन्य होने के वजह से किसान को हर खेती में परेशानी का सामना करना पड़ता है. ऐसा नहीं है कि किसानों के लिए सरकार योजनायें नहीं चल रही है.
योजना तो चल रही है जो अधिकतर जगहों पर कागजों तक ही सिमट कर रह जाती है. क्षेत्र में सिंचाई के लिए मात्र दो ही सुविधा नलकुप व नहर है, जो शायद ही किसी को नसीब होता है. इसके पिछे भी दिक्कतें है वैसे तो अधिकतर जगहों पर नलकुप ध्वस्त हो गये है, लेकिन जहां बचे हुये है वहां नाला के अभाव में सुविधा नहीं मिल पाती है,
जबकि जहां नहर है वहां नहर में पानी ही नहीं है. इस वजह से सरकारी सिंचाई व्यवस्था विफल हो रही है. वहीं दूसरी तरफ रामपट्टी, बैरबन्ना व दुलार पिपराही के किसानों ने बताया कि मौसम की मार के वजह से क्षेत्र के सभी किसान हतोत्साहित है.
क्योंकि अभी किसानों को पानी की आवश्यकता है और बारिश न के बराबर हो रही है. इसके बावजूद किसान कर्ज लेकर पंप सेट से सिंचाई की व्यवस्था कर रहे है, लेकिन वो भी नाकाफी साबित हो रहे है. यह भी बताया गया कि बारिश न के बराबर होने के कारण किसान सही से खेती नहीं कर पा रहे है.
अभी किसानों को पानी उपलब्ध नहीं हो पा रही है. इस वजह से धान के खेती पर असर पर रहा है. क्योंकि अभी धान में बाली आने का समय है और इस वक्त पानी की जरूरत होती है. धान में बाली के 15 दिन बाद फुल आने लगेंगे अगर फुल आने के समय बारिश हो गयी तो भी किसानों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा.
और धान पूरी तरह से खखरी हो जायेगी. अगर फुल के बाद बारिश होती है तो धान पर इसका असर नहीं पड़ेगा. प्रखंड कृषि पदाधिकारी बिजेंद्र कुमार ने बताया कि किसानों के लिए सरकार की ओर से एक लीटर डीजल पर 60 रुपये अनुदान दिया जा रहा है. इसके लिये किसानों को कुछ प्रक्रियाओं से गुजरना होगा.
पुरैनी प्रतिनिधि के अनुसार, 4445 हेक्टेयर में पुरैनी प्रखंड में धान की फसल लगायी गयी है.
जिसमें सरकारी धान का बीज श्रीविधि 44 किसानों ने मुख्यमंत्री बीज विस्तार योजना की बीज 155 किसानों ने जबकि मिनी कीट 22 क्विंटल 20 kg व हाइब्रिड बीज तीन क्विंटल वितरण किया गया है, जबकि सात किसानों को जीरो टिलेज कीट का लाभ दिया गया है. प्रखंड कृषि पदाधिकारी सुभाष प्रसाद सिंह ने बताया की प्रखंड अन्तर्गत धान की फसल की स्थिति संतोषजनक है. समय-समय पर हल्की बारिश भी हो रही है.
फसल की स्थिति बदतर नहीं है. वहीं डीजल अनुदान का लाभ भी पटवन के लिए दिया जा रहा है.