बिना सत्संग के नहीं बदल सकता मनाव का स्वभाव: मोरारी बापू

प्रसिद्ध शिव मंदिर अशोक धाम परिसर में पांचवे दिन बुधवार को मोरारी बापू का प्रवचन हुआ

नृत्य और संगीत साधना का अनिवार्य भाग है, जिसे सुनना व देखना एक साधन रामकथा के चौथे दिन बापू ने प्रभाव व स्वभाव विषय पर प्रवचन दिया लखीसराय. प्रसिद्ध शिव मंदिर अशोक धाम परिसर में पांचवे दिन बुधवार को मोरारी बापू का प्रवचन हुआ. कथा के प्रारंभ में बापू ने कहा यहां महादेव विराजमान हैं, मां बाला त्रिपुर सुंदरी विराजमान हैं, दिव्य नदियों का संगम इधर से उधर प्रवाहित हो रहा है. लखीसराय के विभिन्न क्षेत्र में स्थापित मंदिर व उसमें श्रद्धा से विराजमान भगवान के साथ पंडित, पुरोहित, संत-महात्मा एवं यहां के वृहत गण सभी को व्यास पीठ की ओर से मेरा प्रणाम. उन्होंने कहा श्रृंगी का संबंध हिरण के सिंग से है और हमारे यहां हिरण के सिंग की एक बहुत महिमा है, उसको हर समस्या से बचने का शगुन माना गया है. एक हिरण का सिंग दूसरा सांप जो अपनी काचूर निकलता है उसे बहुत पवित्र माना जाता है. स्वभाव और प्रभाव की चर्चा करते हुए बापू ने कहा कि अपना-अपना स्वभाव भी अपना ऐश्वर्य है. अपने स्वभाव पर बहुत गौरव करना चाहिए. हमें हमारा स्वभाव अच्छा लगना चाहिए अगर हमारा कोई रिपोर्ट कर गलत स्वभाव का सर्टिफिकेट देता है तो सत्संग से धीरे-धीरे स्वभाव में सुधार करें. एकमात्र उपाय सत्संग है सत्संग के सिवाय दुनिया का कोई मीडिया कोई या माध्यम स्वभाव में सुधार नहीं कर सकता है. रामकथा स्वभाव पर काम करता है रामकथा हमें स्वभाव की यात्रा करती है. ‘सरल सुभाव न मन कुटिलाई जथा लाभ संतोष सदई’ कवि कबीर दास के तर्क का हवाला देते हुए बापू ने कहा कि वेशयुक्त साधु का भी सम्मान करना चाहिए. मगर कबीर दास ने सरल स्वभाव वाले प्राणी को साधु कहा है. साधु का स्वभाव बिल्कुल सरल व सुगम किसी भी परिस्थिति दुख में मुख व स्वभाव में चमक साधु की पहचान है. आप अपने मां और पिता के स्वभाव को साधु की कुटिलता के रूप में देख सकते हैं. वर्तमान में प्रभाव की चर्चा करते हुए बापू ने कहा कि आज प्रभाव हमारा ऐश्वर्य बन गया है. धन का प्रभाव, बल का प्रभाव, पद का प्रभाव, रूप का प्रभाव, जानकारी का प्रभाव उसको हमने ऐश्वर्या मान लिया है. जबकि प्रभाव क्षणभंगुर है. समाज में कई लोगों का कुछ सालों तक प्रभाव रहता है. प्रभाव का भी दशक होता है. लोग प्रभाव में आ जाते हैं. 10 साल के बाद प्रभाव बिखर जाता है. मगर स्वभाव स्थायी होता है. स्वभाव में सुधार के लिए संगीत सुनना चाहिए. संगीत ढंग से सुनना भी एक साधन है. नृत्य और संगीत साधना का अनिवार्य भाग है. नृत्य और संगीत के लिए अगर कोई आपकी आलोचना करे तो ‘ओम इग्नोराय नमः’ इस मंत्र का मन ही मन जाप करना चाहिए और अंत में तेरा तुझको अर्पण कहना चाहिए. बापू ने कहा पूरा नौ दिवसीय रामकथा मानस श्रृंगी ऋषि पर ही आधारित रहेगा.

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By Rajeev Murarai Sinha Sinha

Rajeev Murarai Sinha Sinha is a contributor at Prabhat Khabar.

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