Urain Hill Lakhisarai: लखीसराय जिले की उरैन पहाड़ी एक बार फिर इतिहास और पुरातत्व के शोध के केंद्र में है. हाल में किये गये पुरातात्विक सर्वेक्षण में उरैन पहाड़ी और आसपास के क्षेत्र से शिलालेख, प्राचीन मूर्तियों के टुकड़े, पुरातात्विक टीले और मिट्टी के बर्तनों के अवशेष मिले हैं. सर्वेक्षण टीम ने पहाड़ी से जुड़ी संभावित गुफा और बौद्ध काल से संबंधित साक्ष्यों का भी दस्तावेजीकरण किया है.
शोधकर्ताओं के अनुसार, इन प्रमाणों के व्यवस्थित अध्ययन से क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और यहां हुई मानव गतिविधियों को समझने में मदद मिल सकती है. हालांकि, इन स्थलों के काल निर्धारण और ऐतिहासिक महत्व को लेकर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन अभी जरूरी है.
ब्रिटेन और जापान के विशेषज्ञों ने किया सर्वेक्षण
उरैन और आसपास के क्षेत्र में सर्वेक्षण ब्रिटेन की कार्डिफ यूनिवर्सिटी के बुद्धिस्ट स्टडीज के प्रोफेसर मैक्स डीग और जापान की मिय यूनिवर्सिटी की पोस्ट डॉक्टरल रिसर्चर डॉ. शशि अहलावत के नेतृत्व में किया गया.
सर्वेक्षण में बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के तहत बिहार विरासत विकास समिति की टीम ने सहयोग किया. समिति के कार्यपालक निदेशक प्रो. अनिल कुमार की देखरेख में अन्वेषण एवं उत्खनन समन्वयक डॉ. सप्तर्षि चौधरी और रिसर्च असिस्टेंट तिष्या घोष भी टीम में शामिल रहीं.
सर्वेक्षण का मुख्य फोकस उरैन और खकराडीह क्षेत्र में मौजूद शिलालेखों और पुरातात्विक अवशेषों का दस्तावेजीकरण करना था. इस दौरान सरकारी प्रतिनिधियों, पत्रकारों और स्थानीय ग्रामीणों ने भी टीम को स्थानीय स्तर पर जानकारी उपलब्ध कराने में सहयोग किया.
प्रो. मैक्स डीग ने क्षेत्र में मिले प्रमाणों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की जरूरत बतायी. उनका कहना था कि प्रमाणों का विस्तृत अध्ययन होने के बाद ही इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा.
1892 से मिलता है उरैन पहाड़ी का ऐतिहासिक संदर्भ
उरैन पहाड़ी का उल्लेख हालिया सर्वेक्षण तक सीमित नहीं है. ब्रिटिश काल के लेखक लॉरेंस ऑस्टिन वैडेल ने वर्ष 1892 में प्रकाशित जर्नल ऑफ द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल में भी उरैन पहाड़ी से जुड़े बौद्ध साक्ष्यों का उल्लेख किया था.
इसके बाद भी अलग-अलग समय पर पुरातत्वविद और शोधकर्ता इस क्षेत्र का अध्ययन करते रहे हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार, यहां प्राचीन मानव गतिविधि, कृषि और पशुपालन से जुड़े संकेतों के साथ बौद्ध परंपरा से संबंधित अवशेष मिलना इस क्षेत्र को शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है.
पहाड़ी पर मौजूद बुद्ध के चरण चिह्न, बैठी मुद्रा में बने चित्र, चट्टानों पर उकेरी गयी नक्काशी और वर्मी अभिलेख भी शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. इन अवशेषों के संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन से क्षेत्र के इतिहास से जुड़े कई पहलुओं पर नई जानकारी सामने आ सकती है.
खकराडीह के चंडिका स्थान पर भी मिले अवशेष
सर्वेक्षण टीम ने अभयपुर के लोशघानी पंचायत अंतर्गत खकराडीह में भी पड़ताल की. अभयपुर स्टेशन से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित इस स्थान को स्थानीय लोग चंडिका स्थान के नाम से जानते हैं.
यहां भी टीम ने शिलालेखों और प्राचीन मूर्तियों के टुकड़ों का दस्तावेजीकरण किया. उरैन और खकराडीह में मिले साक्ष्यों को एक साथ देखने पर इस पूरे क्षेत्र में प्राचीन गतिविधियों और सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन की संभावना बढ़ती है.
Urain Hill Lakhisarai: लगातार शोध से पर्यटन की उम्मीद बढ़ी
उरैन पहाड़ी में शोधकर्ताओं की रुचि लगातार बढ़ रही है. पिछले वर्ष भी अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी, आईआईटी गुवाहाटी और दिल्ली आर्ट गैलरी से जुड़े शोधकर्ता यहां पहुंचे थे.
लगातार हो रहे सर्वेक्षण और सामने आ रहे पुरातात्विक प्रमाणों से स्थानीय लोगों में क्षेत्र के संरक्षण और पर्यटन विकास को लेकर उम्मीद बढ़ी है. ग्रामीणों का कहना है कि यदि उरैन पहाड़ी और आसपास के पुरातात्विक स्थलों का वैज्ञानिक अध्ययन, संरक्षण और आवश्यक विकास किया जाता है, तो यह क्षेत्र बिहार के बौद्ध पर्यटन मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है.
फिलहाल उरैन पहाड़ी के इतिहास से जुड़े कई सवालों के जवाब विस्तृत पुरातात्विक अध्ययन और संरक्षण कार्य के बाद ही स्पष्ट होंगे. लेकिन हालिया सर्वेक्षण ने इस पहाड़ी और आसपास के क्षेत्र को एक बार फिर शोधकर्ताओं और इतिहास में रुचि रखने वालों के केंद्र में ला दिया है.
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