Barahiya Ganga Water Level: बड़हिया (लखीसराय). मानसून के सक्रिय होते ही गंगा नदी का जलस्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगा है. बुधवार को गंगा का पानी बड़हिया के प्रमुख घाटों तक पहुंच गया. लंबे समय से रेत के मैदान में तब्दील पड़े घाटों पर फिर से पानी लौटने से स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं में खुशी है. हालांकि इस राहत के साथ एक बड़ी चिंता भी सामने आई है. नगर के कॉलेज घाट पर तेज कटाव शुरू हो गया है, जिससे घाट की सुरक्षा और स्थायित्व को लेकर लोगों की चिंता बढ़ गई है.
डेढ़ महीने बाद घाटों पर लौटा गंगा का पानी
इस वर्ष मानसून की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी रही, जिसके कारण गंगा का जलस्तर बढ़ने में देरी हुई. नतीजतन बड़हिया के घाट लंबे समय तक सूखे रहे और रेत का विशाल मैदान बने रहे.
अब पानी पहुंचने के बाद घाटों पर एक बार फिर स्नान, पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक गतिविधियां शुरू होने की उम्मीद बढ़ गई है. स्थानीय लोगों का कहना है कि गंगा का लौटना क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए राहत भरी खबर है.
मुख्य धारा दूर खिसकने से घट रहा ऐतिहासिक घाटों का महत्व
स्थानीय नागरिकों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में गंगा की मुख्य धारा बड़हिया से काफी दूर चली गई है. इसका असर यह हुआ कि साल के अधिकांश समय घाटों पर पानी नहीं रहता.
ऐसी स्थिति में श्रद्धालुओं को स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए हाथीदह के मरांची घाट का रुख करना पड़ता है. इससे बड़हिया के ऐतिहासिक घाटों की उपयोगिता और पहचान लगातार प्रभावित हो रही है.
कॉलेज घाट पर तेज कटाव बना चिंता की वजह
गंगा का जलस्तर बढ़ने के साथ ही नगर के प्रमुख कॉलेज घाट पर कटाव भी तेज हो गया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि सीढ़ी घाट बनने के बाद से नदी की ओर की मिट्टी लगातार कट रही है.
कई स्थानों पर सीढ़ियों के नीचे की मिट्टी बह चुकी है, जिससे घाट का निचला हिस्सा कमजोर पड़ने लगा है. फिलहाल बालू के बोरे लगाकर अस्थायी सुरक्षा का प्रयास किया गया है, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं माना जा रहा.
Barahiya Ganga Water Level: स्थायी समाधान की मांग, प्रशासन से उम्मीद
बढ़ते कटाव को देखते हुए स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन और जल संसाधन विभाग से स्थायी कटावरोधी कार्य कराने की मांग की है. उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में घाट को गंभीर नुकसान हो सकता है.
लोगों ने बड़हिया के ऐतिहासिक घाटों के संरक्षण और गंगा कटाव से बचाव के लिए दीर्घकालिक योजना तैयार करने की भी मांग की है, ताकि धार्मिक आस्था और स्थानीय विरासत दोनों सुरक्षित रह सकें.
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