ठाकुरगंज में कभी लोगों की प्यास बुझाने वाला एक सार्वजनिक कुआं आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार हो गया है. वर्षों पहले जिस कुएं से आसपास के लोग पेयजल और घरेलू उपयोग के लिए पानी लेते थे, आज वह कचरा फेंकने की जगह बन चुका है. कुएं के ऊपर प्लास्टिक, पॉलीथिन, घरेलू कचरा, सूखी टहनियों और पत्तियों का इतना बड़ा ढेर जमा हो गया है कि पहली नजर में यह पहचानना भी मुश्किल हो जाता है कि वहां एक सार्वजनिक कुआं मौजूद है.
लंबे समय से नहीं हुई सफाई, बढ़ा संक्रमण का खतरा
स्थानीय लोगों के अनुसार, लंबे समय से कुएं की सफाई और रखरखाव नहीं होने के कारण इसकी स्थिति लगातार खराब होती गई. कचरे से उठ रही दुर्गंध और बरसात में सड़ते अपशिष्ट के कारण मच्छरों और अन्य कीटों के पनपने की आशंका बढ़ गई है, जिससे आसपास के लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा मंडरा रहा है.
पारंपरिक जलस्रोत बचाने की उठी मांग
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते कचरा हटाकर कुएं की सफाई नहीं कराई गई तो यह पारंपरिक जलस्रोत पूरी तरह समाप्त हो सकता है. लोगों ने सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने और नगर पंचायत की सफाई व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक जलस्रोत केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे जलस्रोतों का कचरे से भर जाना पर्यावरण और जनस्वास्थ्य, दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है.
सुरक्षा घेरा और नियमित सफाई की मांग
स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन और नगर पंचायत से मांग की है कि कुएं से तत्काल कचरा हटाकर उसकी सफाई कराई जाए, चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाया जाए, सूचना पट्ट लगाया जाए तथा कचरा फेंकने वालों पर जुर्माना लगाया जाए. लोगों का कहना है कि समय रहते संरक्षण नहीं किया गया तो यह सार्वजनिक धरोहर हमेशा के लिए खत्म हो सकती है.
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