नेपाल से 16 किमी पदयात्रा कर मुनि जैनेंद्र कुमार का ठाकुरगंज में प्रवेश

विभिन्न समुदायों के लोगों की उपस्थिति ने सामाजिक समरसता और धार्मिक सद्भाव की मिसाल पेश की.

ठाकुरगंज

नेपाल के भद्रपुर से प्रारंभ हुई आध्यात्मिक पदयात्रा ने शुक्रवार को नगर में मंगल प्रवेश किया. इस दौरान पूरे मार्ग में श्रद्धा, भक्ति और अनुशासन का अद्भुत संगम देखने को मिला. भद्रपुर, धुलाबाड़ी, इस्लामपुर और ठाकुरगंज के तेरापंथी श्रद्धालु बड़ी संख्या में इस विहार यात्रा में सहभागी बने. पदयात्रा के दौरान वंदे गुरु वरम् और जय जिनेंद्र के जयघोष से वातावरण गुंजायमान रहा. श्रद्धालुओं की अनुशासित उपस्थिति और साधु-संयम की मर्यादा ने इस यात्रा को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण बना दिया.

धर्मकांटा चौक बना स्वागत का केंद्र

ठाकुरगंज पहुंचने पर धर्मकांटा चौक पर सर्वधर्म समाज के लोगों ने मुनि श्री द्वय का भव्य एवं भावपूर्ण स्वागत किया. विभिन्न समुदायों के लोगों की उपस्थिति ने सामाजिक समरसता और धार्मिक सद्भाव की मिसाल पेश की. नगर में जगह-जगह श्रद्धालुओं द्वारा वंदन, अभिनंदन और आशीर्वाद ग्रहण करने का क्रम देर तक चलता रहा.

दिगंबर जैन धर्मशाला में हुआ प्रभावशाली प्रवचन

मंगल प्रवेश के उपरांत दिगंबर जैन धर्मशाला में आयोजित प्रवचन सभा में मुनि जैनेंद्र कुमार के मुखारविंद से जैन धर्म में विहार के महत्व पर विस्तृत और प्रेरणादायी उद्बोधन दिया गया. उन्होंने कहा कि विहार साधु जीवन की आत्मा है. यह केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, त्याग और अहिंसा का सजीव अभ्यास है. उन्होंने स्पष्ट किया कि एक स्थान पर ठहराव से मन में आसक्ति जन्म लेती है, जबकि निरंतर विहार साधु को अपरिग्रह की भावना में स्थिर रखता है. मुनिश्री ने कहा कि पैदल विहार के माध्यम से साधु-साध्वी सूक्ष्म जीवों की रक्षा करते हुए अहिंसा के सर्वोच्च सिद्धांत का पालन करते हैं. यह जीवनशैली केवल अनुशासन ही नहीं, बल्कि करुणा और संवेदना की पराकाष्ठा है. जैन मुनियों का पैदल विहार केवल यात्रा नहीं, बल्कि समाज से जुड़ने का माध्यम है. मुनि गांव-गांव जाकर लोगों से सीधा संपर्क स्थापित करते हैं और अहिंसा, संयम व त्याग का संदेश देते हैं. विहार के माध्यम से वे न केवल अपनी साधना करते हैं, बल्कि समाज में आध्यात्मिक जागृति भी फैलाते हैं.

विहार: तप, सहनशीलता और कर्म निर्जरा का मार्ग

अपने प्रवचन में उन्होंने विहार को कठिन तपस्या का स्वरूप बताते हुए कहा कि यह साधक के भीतर धैर्य, सहनशीलता और आत्मबल का विकास करता है. विपरीत परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखना ही वास्तविक साधना है, जो कर्मों की निर्जरा में सहायक बनती है. उन्होंने चतुर्मास की परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्षा ऋतु में साधु-साध्वियां एक स्थान पर रुकते हैं, ताकि सूक्ष्म जीवों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके, यह जैन धर्म की सूक्ष्म अहिंसा का सर्वोच्च उदाहरण है. मुनिश्री ने अपने उद्बोधन में उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि वे भी अपने जीवन में संयम, त्याग और अहिंसा को अपनाएं. उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक आचरण में झलकना चाहिए.

उपस्थित गणमान्य व श्रद्धालु

इस अवसर पर पूर्व मुख्य पार्षद देवकी अग्रवाल, वार्ड पार्षद अमित सिन्हा, राजेश जैन, दिलीप अग्रवाल, चंद्रशेखर अग्रवाल, आनंद जैन, विनय जैन, संतोष जैन, पंकज जैन सहित बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित रहीं. साथ ही इस्लामपुर, धुलाबाड़ी और भद्रपुर से आए जैन धर्मावलंबियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही.

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By AWADHESH KUMAR

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