ठाकुरगंज में आस्था का अनोखा संगम, शिव–पार्वती की दुर्लभ प्रतिमा बनी आकर्षण

Kishanganj News: किशनगंज का ऐतिहासिक श्री हरगौरी मंदिर 129 वर्षों से आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां शिव और पार्वती की दुर्लभ संयुक्त प्रतिमा श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है.

Kishanganj News: ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट. 129 वर्षों से आस्था का केंद्र बना श्री हरगौरी मंदिर एक बार फिर भक्तों की भारी भीड़ से गूंज उठा. सोमवार की सुबह नगर क्षेत्र के शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं. भक्तों ने भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक कर बेलपत्र, फूल और धतूरा अर्पित किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की.

हर-हर महादेव के जयकारों से गूंजा मंदिर परिसर

सुबह से ही महिला, पुरुष और युवा श्रद्धालु पूजा सामग्री लेकर मंदिर पहुंचने लगे. पूरे परिसर में “हर-हर महादेव” के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो गया. शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ती रही.

129 वर्षों से अटूट आस्था का केंद्र

स्थानीय लोगों के अनुसार श्री हरगौरी मंदिर करीब 129 वर्ष पुराना है और आज तक कोई भी श्रद्धालु यहां से खाली हाथ नहीं लौटा. यह मंदिर वर्ष भर आस्था का केंद्र बना रहता है और सोमवार को यहां विशेष भीड़ देखने को मिलती है.

पौराणिक शिवलिंग और टेगोर परिवार से जुड़ा इतिहास

जानकारों के अनुसार ठाकुरगंज का पुराना नाम कनकपुर था. वर्ष 1880 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई सर ज्योतिन्द्र मोहन ठाकुर ने इस क्षेत्र का विकास शुरू किया. वर्ष 1897 में खुदाई के दौरान पांडवकालीन अवशेषों के बीच एक दुर्लभ शिवलिंग मिला, जिसमें आधे भाग में मां पार्वती की आकृति अंकित है.

बताया जाता है कि इसे पहले कोलकाता ले जाने की तैयारी थी, लेकिन स्वप्न में संकेत मिलने के बाद इसे पुनः ठाकुरगंज लाकर स्थापित किया गया.

शिव और पार्वती की संयुक्त प्रतिमा बनी विशेष आकर्षण

श्री हरगौरी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां शिव और पार्वती की संयुक्त प्रतिमा एक ही शिवलिंग में अंकित है. यह स्वरूप अत्यंत दुर्लभ माना जाता है. श्रद्धालु मानते हैं कि यह प्रतिमा जीवंत प्रतीत होती है और इसी कारण दूर-दूर से लोग दर्शन के लिए आते हैं.

पीढ़ियों से जारी है पूजा परंपरा

मंदिर में आज भी पार्वती चरण गांगुली और जयंत गांगुली जैसे पुरोहित परिवार पूजा-अर्चना की परंपरा निभा रहे हैं. बताया जाता है कि वर्ष 1901 से यहां नियमित पूजा शुरू हुई थी.

ठाकुरगंज की पहचान बना मंदिर

स्थानीय लोगों के सहयोग से बना यह मंदिर आज केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि ठाकुरगंज की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान भी बन चुका है.

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लेखक के बारे में

Published by: Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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