गांव से गुम हो रहा है जोगीरा का स्वर फीका पड़ रहा है फगुआ का रंग

फाल्गुन की आहट के साथ ही कभी गांवों की चौपाल जोगीरा और फगुआ के सुरों से गूंज उठती थी

गोगरी फाल्गुन की आहट के साथ ही कभी गांवों की चौपाल जोगीरा और फगुआ के सुरों से गूंज उठती थी. ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की थाप पर जोगीरा सा रा रा रा की तान ऐसा समां बांधती थी कि पूरा गांव उत्सवमय हो जाता था. होली से कई दिन पूर्व ही रात की बैठकी का दौर शुरू हो जाता था, जिसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग एक साथ बैठकर सामूहिक रूप से फगुआ गाते थे. इन लोकगीतों में हास्य-व्यंग्य के साथ समाज को आईना दिखाने वाले संदेश भी छिपे होते थे. चौपाल केवल गीत-संगीत का मंच नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और संवाद का सशक्त केंद्र थी. यहीं आपसी मतभेद दूर होते, रिश्तों में मिठास घुलती और गांव की सामूहिक संस्कृति सजीव होती थी. समय के बदलते दौर और आधुनिकता की तेज रफ्तार ने इस परंपरा को प्रभावित किया है. पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जगह अब डीजे और फिल्मी गीतों का शोर सुनाई देता है. नयी पीढ़ी मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में व्यस्त है, जिससे चौपालों की सामूहिक बैठकी लगभग समाप्त हो चुकी है. ग्रामीण बुजुर्ग बताते हैं कि पहले होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का माध्यम थी. आज यह पर्व कई जगहों पर औपचारिकता तक सीमित होता जा रहा है. ग्रामीणों और सांस्कृतिक प्रेमियों ने पारंपरिक फगुआ गायन और जोगीरा की लोकधुन को पुनर्जीवित करने की अपील की है, ताकि होली का असली रंग, अपनापन और लोकसंस्कृति की मिठास एक बार फिर गांवों की फिजाओं में घुल सके.

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