खगड़िया/गोगरी : जीएसटी लागू हुए ढाई साल पूरा हो गया. लोगों को जीएसटी बिल लेने के लिए सरकार द्वारा प्रेरित भी किया जा चुका है. बावजूद इसके ज्यादातर दुकानदार टैक्स की चोरी करने के लिए कच्चे बिल से ही अभी भी काम चला रहे हैं.
उपभोक्ताओं को ज्यादा पैसा लगने की उल्टी सीधी बात पढ़ाकर कच्चा बिल पकड़ा रहे हैं. सरकार को जीएसटी टैक्स के रूप में चूना तो लग ही रहा है, उपभोक्ता भी लूट रहे हैं. कई ग्राहकों को तो जीएसटी बिल के बारे में अभी भी पूर्ण जानकारी नहीं है.
कई व्यवसायी भी अभी तक जीएसटी बिल के बारे में कम ही जानते हैं. बावजूद उपभोक्ताओं को अपने अधिकार की बखूबी जानकारी है, और समान की खरीदारी पर ये मोलभाव भी करते हैं. लेकिन खरीदे गए समान का बिल लेने का दिल अभी यहां के उपभोक्ताओं को नहीं करता है. दुकान पर पहुंचे, समान का मोल भाव किया और कुछ मोल-तोल कराकर खरीदारी करने की प्रवृत्ति यहां आम उपभोक्ताओं में अब भी बनी हुई है.
हां, बात जब महंगे समान की आती है और उस पर गारंटी-वारंटी का चक्कर होता है तब बिल जरूर लिया जाता है. इन महंगी सामग्री की गुणवत्ता के प्रति भी उपभोक्ता सजगता दिखते हैं. इस सजगता का नतीजा है कि उपभोक्ता न्यायालय में पांच सौ से अधिक मामले लंबित हैं.
ऐसा तब है जबकि प्रति माह उपभोक्ता न्यायालय से औसत 10 से 15 मामले निपटा दिए जाते हैं. लेकिन उपभोक्ता न्यायालय में पहुंचने वाले ये मामले महंगी सामग्री की खरीदारी, निजी चिकित्सकीय सेवा में त्रुटि, बीमा और बैंक से ही संबंधित हैं. उपभोक्ता संरक्षण कानून की जानकारी होने के बाद भी उपभोक्ता सामान्य खरीदारी और उसके बिल के प्रति उदासीन ही बने हुए हैं.
शिक्षण संस्थानों के प्रति है उदासीनता. उपभोक्ता संरक्षण के दायरे में आने के बाद भी यहां लोगों में शिक्षण संस्थानों की सेवा के प्रति उदासीनता बनी हुई. पढ़ाई से लेकर फीस को लेकर शिक्षण संस्थानों में हो-हंगामा भी होता रहता है.
लेकिन इसका भी दायरा सिर्फ सरकारी स्कूलों और कालेजों तक ही सिमटा हुआ है. निजी शिक्षण संस्थानों की सेवा की शिकायत तो की जाती रहती है. लेकिन इनकी सेवा में त्रुटि का मामला आज तक उपभोक्ता न्यायालय तक नहीं पहुंचा.
बिका माल वापस नहीं, एक्ट का उल्लंघन . अगर कोई दुकानदार बिके हुए माल को वापस करने से इंकार करता है तो यह भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 14 का उल्लंघन है. इसके तहत जरूरी यह है जब आपने सामान खरीदा है तो उसका रसीद दुकानदार ने आपको दिया हो.
रसीद प्राप्त करना हर व्यक्ति का अधिकार. एक्ट के प्रावधान के अनुसार सामान खरीदने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सामान का रसीद पाने का अधिकार है. नियमों की मानें तो रसीद नहीं देने वाले दुकानदारों पर कार्रवाई हो सकती है. ऐसे में अगर कोई दुकानदार सामान का रसीद नहीं देता है तो उसके यहां सामान ही आप न खरीदें. रसीद प्राप्त करने पर सामान की गुणवत्ता की गारंटी रहती है.
कहते हैं ग्राहक व दुकानदार
नगरपालिका रोड निवासी अंजय कुमार व मेडिकल दुकानदार अजय राठौर का कहना है कि सरकार ने जीएसटी को लागू तो कर दिया लेकिन जीएसटी के बारे में अभी भी ग्राहकों को कोई विशेष जानकारी नहीं है.
इस वजह से लोग भी लेने में रुचि नहीं दिखाते हैं.हाजीपुर निवासी मिथलेश कुमार व जमालपुर पंसारी रोड निवासी विकास आनंद कहते हैं कि दुकानदार द्वारा मामले पर भी जीएसटी की वजह से पक्का बिल नहीं दिया जाता है.
बहुत कहने पर कच्चा बिल थमा देते हैं. हाजीपुर निवासी अजीत कुमार व जमालपुर रामपुर रोड निवासी शिवम कुमार कहते हैं कि कई दुकानदार जीएसटी में अधिक पैसा लगने की बात बता कर जीएसटी बिल के बदले कच्चा बिल पकड़ा देते हैं. जबकि कच्चा बिल पर सामान की कोई गारंटी वारंटी नहीं होती.
हाजीपुर निवासी हीरा कुमार व अनिल चौधरी कहते है कि लोगों को हर सामान का बिल लेना चाहिए. लेकिन हड़बड़ी की वजह से लोग बिना बिल लिए ही चल देते हैं. जिसका सबसे ज्यादा फायदा दुकानदारों को होता है. हाजीपुर निवासी सुरेंद्र कुमार कहते हैं कि जीएसटी की जानकारी बहुत लोगों को नहीं रहने के कारण लोग बिल लेते ही नहीं हैं. लोगों में जागरूकता की कमी का फायदा दुकानदारों को होता है.
उपभोक्ता फोरम इन मामलों में देगा राहत
यदि क्रय की गई वस्तु में एक या अधिक त्रुटियां हो.
भाड़े पर ली गई या उपयोग की गई सेवाओं में किसी भी प्रकार की कमी हो.
यदि किसी व्यापारी द्वारा कोई अनुचित व्यापारिक व्यवहार अपनाया गया हो.
जीवन की सुरक्षा को जोखिम पैदा करने वाला सामान.
घटिया समान की बिक्री करने पर.
वारंटी बताकर सामान वापस नहीं करने पर
