खगड़िया : शहीद जावेद के मित्र मो. इरशाद, परवेज, अरशद, मो इमरान, ने बताया कि उनकी व जावेद की बचपन से मित्रता थी. वह बहुत अच्छा क्रिकेट खेलता था. जब भी वह गांव आता था, साथ में स्कूल के फील्ड पर क्रिकेट खेला करता था. बॉलिंग और बैटिंग दोनों पर उसकी गजब की पकड़ थी.
घर आने पर गांव के विकास और बच्चों की शिक्षा पर बात करता था. जावेद तुझे अब हम देख नहीं पायेंगे. आज माड़र दक्षिणी गांव के उस पीपल पेड़ के पत्ते भी फड़फड़ा नहीं रहे थे, जिसकी छांव में तुम खेला करते थे.पीपल की ओट से जब तुम्हारी अंतिम यात्रा को कैद करने के लिए कैमरे के फ्लैश चमक रहे थे, तो उसे देख बगल के तालाब का पानी भी स्थिर हो गया था.स्कूल का वो मैदान तुम्हें देख जार-जार रोता लगा.
जब उसके प्रांगण में तुम्हारा पार्थिव शरीर पहुंचा, तो वो स्तब्ध था. वो मैदान भी तो हजारों कदमों के भार से बोझिल हो गया,जहां तुम कुछ साल पहले छक्के-चौके के लिए बल्ला घुमाते थे. सोचो जावेद वो गलियां कितना आज कितना रोयी होगी, जहां तुम नन्हें से जवान हुए और आज आर्मी फोर्स के आठ जवानों के कंधे पर उतरे नहीं उतारे गये. तुम्हारी मां बिलख रही थी, तो सबकी आंखों के पोर डबडबा गये थे. ऐसे में सवाल है कि क्या शहादत का यह सिलसिला इसी तरह चलता रहेगा.
