कटिहार के बरारी से हरजीत सिंह की रिपोर्ट
Sahyog Shivir: बिहार सरकार के निर्देश पर ग्रामीण स्तर पर जन-समस्याओं के निपटारे के लिए चलाए जा रहे ‘सहयोग शिविर’ की जमीनी हकीकत और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की पोल खोलती एक विचलित करने वाली खबर कटिहार जिले के बरारी प्रखंड से सामने आई है. गंगा नदी के उसपार बसी प्रखंड की एकमात्र भौगोलिक रूप से कटी हुई पंचायत ‘बकिया सुखाय’ तक पहुंचने के लिए मंगलवार को प्रशासनिक टीम और आम लोगों को प्रकृति और कुव्यवस्था से कड़ा संघर्ष करना पड़ा. भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच मोटरबोट से गंगा पार करते समय हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के कारण अफरा-तफरी मच गई. इस घटना ने न केवल विभागीय तैयारियों पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं, बल्कि इस टापू नुमा क्षेत्र की दशकों पुरानी पक्की कनेक्टिविटी और पुल निर्माण की मांग को एक बार फिर हवा दे दी है.
बीच धारा में उठने लगी भाप, महिला चिकित्सक सहित कई अधिकारी हुए अचेत
काढ़ागोला घाट से बकिया सुखाय गांव तक की इस कठिन प्रशासनिक यात्रा का सिलसिलेवार और आंखो देखा विवरण निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
- तापमान का तांडव: मंगलवार दोपहर बरारी प्रखंड प्रशासन द्वारा बकिया सुखाय में सहयोग शिविर का आयोजन तय था. शिविर में ड्यूटी बजाने के लिए प्रशासनिक अधिकारी, मेडिकल टीम, लिपिक और स्थानीय किसान-मजदूर सुबह-सुबह काढ़ागोला घाट पर एकत्र हुए. आसमान से सुबह से ही आग बरस रही थी.
- मझधार में बिगड़ी तबीयत: पूरी टीम जब एक बड़ी मालवाहक मोटर चालित नाव (स्टीमर) पर सवार होकर गंगा पार करने निकली, तो बीच धारा में पहुंचते ही पानी की सतह से उठने वाली गर्म भाप और ऊपर से पड़ रही सीधी धूप के कारण नाव का केबिन भट्टी की तरह तपने लगा. लगातार दो घंटे की इस बेहद धीमी और झुलसाने वाली यात्रा के दौरान दमघोंटू उमस से लोगों को चक्कर आने लगे और उल्टियां शुरू हो गई. लू की चपेट में आने से टीम में शामिल एक महिला डॉक्टर की तबीयत अचानक बेहद नासाज हो गई, जिससे नाव पर चीख-पुकार मच गई.
- ओआरएस (ORS) बना तारणहार: स्थिति बिगड़ती देख नाव पर मौजूद डॉ. मुशर्रफ हुसैन ने त्वरित सूझबूझ का परिचय दिया. उन्होंने तुरंत अपने मेडिकल किट से ओआरएस का पैकेट निकाला और ठंडे पानी में घोल बनाकर बीमार महिला डॉक्टर सहित अचेत हो रहे अन्य कर्मियों को पिलाया. साथ ही बिस्किट और प्राथमिक उपचार (First Aid) देकर सभी की स्थिति को नियंत्रित किया, जिसके बाद नाव बकिया घाट पर सुरक्षित लैंड कर सकी.
घाट से शिविर तक नरकीय रास्ता: धूल, कीचड़ और ट्रैक्टर की सवारी
जमीनी बदहाली: बकिया घाट पर उतरने के बाद भी अधिकारियों की परीक्षा समाप्त नहीं हुई. घाट से मुख्य गांव और शिविर स्थल तक जाने वाली संपर्क सड़क का नामोनिशान नहीं था. पूरी टीम को धूल गुबार उड़ाते रास्तों और दलदली कीचड़ के बीच से पैदल या ट्रैक्टर की ट्रालियों पर लदकर जाना पड़ा. चिलचिलाती धूप में पैदल चलने के कारण कई बुजुर्ग ग्रामीण रास्ते में ही पेड़ों की छांव में बैठ गए. स्थानीय निवासियों ने रोष जताते हुए कहा, “कागजों पर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर हम आज भी आदिम युग में जी रहे हैं. बरसात में यह इलाका बाढ़ के पानी में डूब जाता है और गर्मी में धूल और लू हमें मार देती है.”
देर रात 8 बजे थके-हारे लौटे कर्मी, ग्रामीणों ने पूछा- इस तपन में शिविर की क्या तुक?
प्रशासनिक टाइमिंग पर सवाल:
सहयोग शिविर का काम जैसे-तैसे निपटाकर देर शाम करीब 08:00 बजे पूरी प्रशासनिक टीम थकी-हारी वापस काढ़ागोला घाट लौटी. लौटते समय भी घने अंधेरे और धूल भरे रास्तों के बीच उसी खतरनाक दो घंटे की नाव यात्रा का जोखिम उठाना पड़ा. शिविर से लौट रहे एक जागरूक ग्रामीण ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब सरकार को पता है कि इस सुदूर पंचायत तक पहुंचने का रास्ता इतना दुर्गम और जानलेवा है, तो इस भीषण नौतपा और रेड अलर्ट वाली गर्मी में ऐसे शिविर आयोजित करने का क्या तुक है? क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा था?
चिकित्सा परामर्श और पक्के पुल के निर्माण की पुरजोर मांग
निष्कर्ष और जन-आक्रोश:
इस घटना के बाद बकिया सुखाय और बरारी के प्रबुद्ध नागरिकों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जिला पदाधिकारी से मांग की है कि गंगा उसपार के हजारों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी को सुरक्षित करने के लिए काढ़ागोला घाट से बकिया सुखाय तक एक स्थायी पक्के पुल (Bridge Construction) या वैकल्पिक सुदृढ़ मार्ग की स्वीकृति दी जाए.
वहीं, मौके पर मौजूद डॉ. मुशर्रफ हुसैन ने आम जनता और फील्ड अधिकारियों को सख्त हिदायत दी है कि जून की इस अप्रत्याशित गर्मी और लू के मौसम में जब तक बहुत अनिवार्य न हो, तब तक जलमार्ग या खुली धूप में लंबी यात्राओं से पूरी तरह परहेज करें. घर से बाहर निकलते समय सूती कपड़े से सिर-चेहरा ढकें और साथ में पर्याप्त पानी व ओआरएस का घोल जरूर रखें. ग्रामीणों का साफ कहना है कि जब तक इस क्षेत्र को पक्की कनेक्टिविटी (Road Connectivity) नहीं मिलती, तब तक सरकार के डिजिटल इंडिया और विकास के तमाम दावे खोखले ही साबित होंगे.
