कैमूर जिले के कुदरा नगर पंचायत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनाथ रस्तोगी ‘व्याकुल’ की जन्मशती के अवसर पर उनके संघर्ष और देशसेवा को याद किया जा रहा है. 3 सितंबर 2026 को उनकी जन्मशती पूरी हो रही है. भारत छोड़ो आंदोलन में छात्र जीवन से ही सक्रिय रहे रामनाथ रस्तोगी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई और जेल की यातनाएं भी सहीं.
भारत छोड़ो आंदोलन ने बदली रामनाथ की जिंदगी
1942 में जब महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का आह्वान किया, उस समय रामनाथ रस्तोगी सासाराम हाई स्कूल में दसवीं के छात्र थे. अंग्रेजी शासन के अत्याचारों से व्यथित होकर वे अपने साथियों के साथ आंदोलन में कूद पड़े. उन्होंने छात्रों पर हो रहे अत्याचार का विरोध किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ धरना दिया.
लाठी-गोली के बीच किया अंग्रेजों का विरोध
आंदोलन के दौरान अंग्रेज पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसायीं और गोली चलाने की धमकी दी, लेकिन रामनाथ रस्तोगी पीछे नहीं हटे. पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर अन्य साथियों के साथ सासाराम जेल भेज दिया. अदालत ने उन्हें छह माह के सश्रम कारावास और 100 रुपये जुर्माने की सजा सुनायी.
हजारीबाग जेल में स्वतंत्रता सेनानियों का मिला साथ
सजा के करीब तीन माह बाद रामनाथ रस्तोगी को सेंट्रल जेल हजारीबाग भेज दिया गया. वहां उनकी मुलाकात जगत नारायण लाल, जगलाल चौधरी, रामवृक्ष बेनीपुरी और सदानंद मिश्रा जैसे स्वतंत्रता सेनानियों से हुई. इसी जेल में उनके मित्र और सहपाठी जयप्रकाश नारायण भी बंद थे. इन क्रांतिकारियों के साथ ने रामनाथ के भीतर देशप्रेम की भावना को और मजबूत किया.
गीत और कविताओं से बढ़ाते थे साथियों का हौसला
जेल में रहते हुए भी रामनाथ रस्तोगी का संघर्ष जारी रहा. वे गीत और कविताओं के माध्यम से साथी बंदियों का मनोबल बढ़ाते थे. पत्रों के जरिए बाहर मौजूद लोगों को भी देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए प्रेरित करते रहे. जेल की कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने लेखन और रचनात्मक कार्य जारी रखा.
रिहाई के बाद शिक्षा और देशसेवा का सफर
मार्च 1944 में जेल से रिहा होने के बाद उनका विवाह जानकी देवी से हुआ. पत्नी जानकी देवी उनके जीवन की बड़ी प्रेरणा बनीं.. इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए काशी विद्यापीठ में दाखिला लिया. वहां लाल बहादुर शास्त्री, संपूर्णानंद, आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेंद्र देव सहित कई महान लोगों के संपर्क में आए.
आजादी के बाद भी समाजसेवा को बनाया जीवन का लक्ष्य
1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन रामनाथ रस्तोगी का समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण जारी रहा. उन्होंने अपना जीवन समाज के विकास और देशहित के लिए समर्पित कर दिया. छुआछूत, जाति-पाति, भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ वे हमेशा आवाज उठाते रहे। स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को भी उन्होंने जीवन का हिस्सा बनाया.
‘व्याकुल’ नाम से भी मिली अलग पहचान
देश और समाज के प्रति उनकी बेचैनी के कारण उन्होंने अपने नाम के साथ ‘व्याकुल’ शब्द जोड़ा. उनका जीवन सादगी, उच्च विचार, देशप्रेम और समाजसेवा का उदाहरण रहा. स्थानीय लोगों के बीच वे एक साहसी, कर्मठ और समाजसेवी व्यक्तित्व के रूप में याद किए जाते हैं.
1969 में हुआ निधन, कुदरा में बना स्मारक
6 नवंबर 1969 को रामनाथ रस्तोगी ‘व्याकुल’ का निधन हो गया. उनके सम्मान में कुदरा प्रखंड परिसर में स्मारक स्थापित किया गया है. स्मारक पर स्वतंत्रता सेनानियों के नाम के साथ संविधान की प्रस्तावना भी अंकित है, ताकि आने वाली पीढ़ियां स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष और बलिदान को जान सकें.
पत्नी जानकी देवी को मिला ताम्रपत्र सम्मान
रामनाथ रस्तोगी के निधन के बाद उनकी पत्नी जानकी देवी को स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और सहयोग के लिए 15 अगस्त 1972 को स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से ताम्रपत्र प्रदान किया गया. वर्ष 1992-93 में भारत छोड़ो आंदोलन की स्वर्ण जयंती पर भी उन्हें स्वतंत्रता संग्राम की महान योद्धा के रूप में सम्मानित किया गया.
डाक विभाग ने भी देशभक्त दंपती को किया सम्मानित
वर्ष 2011 में भारत सरकार के डाक विभाग ने दिल्ली में आयोजित इंडिपेक्स विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी के दौरान रामनाथ रस्तोगी और जानकी देवी की स्मृति में ‘माई स्टांप’ जारी किया। इसके बाद 30 नवंबर 2024 को पटना में आयोजित बिहार डाक टिकट प्रदर्शनी में रामनाथ रस्तोगी ‘व्याकुल’ की स्मृति में विशेष आवरण भी जारी किया गया.
जन्मशती पर फिर याद किया जाएगा अमर योगदान
रामनाथ रस्तोगी ‘व्याकुल’ की जन्मशती 3 सितंबर 2026 को पूरी होगी। उनकी संघर्षगाथा यह याद दिलाती है कि आजादी केवल बड़े नेताओं के प्रयासों से नहीं, बल्कि हजारों गुमनाम सेनानियों के त्याग और साहस से मिली. कुदरा और शाहाबाद क्षेत्र के इस स्वतंत्रता सेनानी को उनकी जन्मशती पर याद करना आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से जोड़ने की एक महत्वपूर्ण पहल है.
