मैनुद्दीन शाह, कर्मनाशा. भारत को अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी से आजाद कराने में कैमूर जिले के दुर्गावती प्रखंड के वीर सपूतों ने अहम भूमिका निभाई. इनमें गायत्री चौबे, अंतू राम हजाम और भोला चमार का नाम प्रमुख रूप से शामिल है. इसके अलावा ढाई दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दुर्गावती प्रखंड मुख्यालय परिसर में लगे शिलापट्ट पर दर्ज हैं. हालांकि, आजादी के इतने वर्षों बाद भी इन वीर स्वतंत्रता सेनानियों की याद में दुर्गावती में शहीद स्मारक का निर्माण नहीं हो सका है.
नमक सत्याग्रह और अगस्त क्रांति में निभाई भूमिका
दुर्गावती क्षेत्र के इन स्वतंत्रता सेनानियों ने नमक सत्याग्रह, अगस्त क्रांति और भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दिनेश गौरी के नेतृत्व में भोलाराम, गायत्री चौबे, पितांबर पांडे, अलियार सिंह, ठाकुर दयाल सिंह, रामनरेश यादव, अवधेश कुमार, लाल बिहारी दुबे, बांके दुबे और सत्तार मियां समेत कई सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था.
अंग्रेजों के खिलाफ उग्र हुआ आंदोलन
स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाया. आंदोलनकारियों ने रेल की पटरियां तक उखाड़ दीं और भारत माता की जय के नारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा. स्वतंत्रता सेनानी पैदल दूर-दूर तक जाकर लोगों को आंदोलन से जोड़ते थे. इससे आंदोलन का दायरा लगातार बढ़ता गया और ब्रिटिश हुकूमत की चिंता भी बढ़ने लगी.
गायत्री चौबे को जेल में दी गईं भीषण यातनाएं
दहियाव गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी गायत्री चौबे को अंग्रेजों ने उनके घर से गिरफ्तार कर गया जेल भेज दिया था. उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गयी. जेल में रहने के बावजूद वह अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को संगठित कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे. इसकी जानकारी मिलने पर अंग्रेजों ने उन्हें पटना के बांकीपुर जेल भेज दिया. आरोप है कि वहां उन्हें बेहद यातनाएं दी गयीं और उनकी दाढ़ी, मूंछ व बाल तक उखाड़े गये. यातनाओं के कारण वह जेल में ही शहीद हो गये. अंग्रेजों ने उनका शव भी परिजनों को नहीं सौंपा.
भोला चमार और अंतू राम हजाम ने भी दी जान
इसी तरह भोला चमार और अंतू राम हजाम को भी अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर अलग-अलग जेलों में बंद कर दिया. दोनों को भी यातनाएं दी गयीं और वे जेल में ही शहीद हो गये. इन वीरों ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया. उनके बलिदान की याद आज भी स्थानीय लोगों को देश के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देती है.
शहीद स्मारक के इंतजार में बीत गए आजादी के साल
आज देश आजाद है और लोग खुली हवा में सांस ले रहे हैं, लेकिन जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने इसके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया, उनकी याद में दुर्गावती में अब तक शहीद स्मारक नहीं बन सका है. स्थानीय लोगों का कहना है कि इन वीर सपूतों के सम्मान में स्मारक का निर्माण होना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके संघर्ष और बलिदान को जान सकें.
शिलापट्ट पर दर्ज हैं कई स्वतंत्रता सेनानियों के नाम
दुर्गावती प्रखंड मुख्यालय परिसर में लगे शिलापट्ट पर कई स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दर्ज हैं. इनमें दिनेश गौरी, श्याम नारायण सिंह, वशिष्ठ पांडे, मंगल चरण सिंह, अलियार सिंह, शिवरतन प्रसाद गुप्ता, श्रीराम राम, केसरी दुबे, धनपति पांडे, संत प्रसाद सिंह, बाकी बिहारी दुबे, रामचरित्र सिंह यादव, राम गोविंद लोहार, काशी यादव, श्रीराम साह, लालू दुबे, सत्तार मियां, राजकुमार सिंह, श्याम सुंदर सिंह, जयनाथ सिंह, कल्पनाथ सिंह, रामनाथ सिंह, नन्हकू राम बारी, भोलाराम, किशुन केवट, हीरा सिंह, जोखू सिंह, पितांबर पांडे, रामनरेश यादव और रामसुमन बारी समेत कई नाम शामिल हैं.
शहीदों की याद में स्मारक की मांग
स्थानीय लोगों का मानना है कि दुर्गावती में शहीद स्मारक बनने से स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को स्थायी पहचान मिलेगी. साथ ही युवाओं को देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा भी मिलेगी. आजादी के इन गुमनाम और उपेक्षित नायकों की वीरगाथा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए शहीद स्मारक का निर्माण जरूरी बताया जा रहा है.
