Kaimur News : परसिया चातुर्मास महोत्सव के तहत आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में पूज्य श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भक्ति, योग और आत्मसंयम का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य परमात्मा की भक्ति, आत्मसंयम और योग के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति करना है. साधक को अपने मन, वाणी, विचार और इंद्रियों को संयमित कर भगवान के दिव्य स्वरूप में स्थिर रहना चाहिए.
योग के चार स्वरूपों की दी जानकारी
स्वामी जी ने कहा कि आत्मा का परमात्मा में विलीन होना ही योग है. उन्होंने मंत्र योग, लय योग, हठ योग और राजयोग की विस्तार से व्याख्या करते हुए बताया कि भगवान के नाम का जप, निरंतर ईश्वर चिंतन, श्वास और इंद्रियों पर नियंत्रण तथा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का अभ्यास आत्मशुद्धि का सर्वोत्तम मार्ग है.
यम-नियम को बताया जीवन की नींव
प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे यम मानव जीवन की आधारशिला हैं. वहीं संतोष, क्षमा, धैर्य और अनुशासित जीवन व्यक्ति के चरित्र को महान बनाते हैं. उन्होंने श्रद्धालुओं से सदाचार और संयम का पालन करने का आह्वान किया.
माता-पिता की सेवा और वैदिक परंपरा पर दिया जोर
स्वामी जी ने कहा कि माता-पिता की सेवा, ऋषि एवं देव ऋण का निर्वहन और वैदिक परंपराओं का पालन प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है. भगवान बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि निष्कपट श्रद्धा, समर्पण और सच्ची भक्ति से प्रसन्न होते हैं.
नारायण की अनन्य भक्ति से मिलता है मोक्ष
राजा परीक्षित और शुकदेव जी के संवाद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि निष्काम, सकाम या मोक्ष की इच्छा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को भगवान नारायण की अनन्य भक्ति करनी चाहिए. प्रवचन के अंत में उन्होंने कहा कि भक्ति, योग, सेवा, संयम और सत्कर्म का मार्ग अपनाकर ही मनुष्य परम आनंद, शांति और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है.
