कैमूर के 700 साल पुराने बैजनाथ धाम में उमड़ा आस्था का सैलाब, यूपी-बिहार से पहुंचे कांवरियों ने किया जलाभिषेक

सावन की पहली सोमवारी पर ऐतिहासिक बैजनाथ शिव मंदिर में कांवरियों की भारी भीड़ उमड़ी। हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठा पूरा मंदिर परिसर, जानें मंदिर का इतिहास।

Sawan 2026 : सावन की पहली सोमवारी पर प्रखंड क्षेत्र के ऐतिहासिक एवं अति प्राचीन बैजनाथ शिव मंदिर में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा. सुबह की पहली किरण के साथ ही मंदिर परिसर "हर-हर महादेव", "बोल बम" और "ॐ नमः शिवाय" के जयघोष से गूंज उठा. उत्तर प्रदेश और बिहार के विभिन्न जिलों से पहुंचे सैकड़ों कांवरियों और श्रद्धालुओं ने भगवान भोलेनाथ का गंगाजल से जलाभिषेक कर परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्यता और विश्व कल्याण की कामना की.

यूपी-बिहार से पहुंचे कांवरिये, दिनभर लगी रही लंबी कतार

अहले सुबह से ही मंदिर के मुख्य द्वार से लेकर परिसर तक श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी रही. दोपहर तक पूरा बैजनाथ धाम शिवभक्तों से खचाखच भरा रहा. उत्तर प्रदेश के जमानिया, गाजीपुर, चंदौली और दिलदारनगर सहित बिहार के कई क्षेत्रों से पहुंचे कांवरियों ने जमानिया गंगा घाट से पवित्र गंगाजल भरकर कई किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी की और विधि-विधान से भगवान शिव का जलाभिषेक किया. जलाभिषेक के बाद श्रद्धालुओं ने मंदिर में मत्था टेककर अपनी मनोकामनाएं मांगी.

सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम

बैजनाथ धाम की विशेषता यह है कि सावन के प्रत्येक सोमवार को उत्तर प्रदेश और बिहार से बड़ी संख्या में कांवरिये यहां पहुंचते हैं. वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है. दिनभर मंदिर परिसर शिव भक्ति, भजन-कीर्तन और संकीर्तन से भक्तिमय बना रहा.

700 साल पुराना है बैजनाथ शिव मंदिर

मंदिर के पुजारी राजू मिश्रा ने बताया कि बैजनाथ शिव मंदिर लगभग 700 वर्ष पुराना है. मंदिर के चारों कोनों पर आज भी चार प्राचीन कुंड जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मौजूद हैं. उन्होंने बताया कि मंदिर परिसर में मिली खंडित मूर्तियां मां मुंडेश्वरी धाम परिसर में रखी मूर्तियों से काफी मिलती-जुलती हैं. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से आने वाले भक्तों की हर मनोकामना भगवान भोलेनाथ पूरी करते हैं.

खजुराहो शैली की झलक और अनोखी ऐतिहासिक विरासत

जानकारों के अनुसार मंदिर का निर्माण चंदेल वंश के शासनकाल में खजुराहो के शिव मंदिर की तर्ज पर कराया गया था. मंदिर की अष्टकोणीय संरचना, प्राचीन मूर्तियां और पत्थरों पर अंकित रहस्यमयी लिपियां इसकी ऐतिहासिक विरासत को दर्शाती हैं. मंदिर परिसर में पहले दो सुरंगें भी थीं, जिन्हें बाद में ग्रामीणों के सहयोग से बंद कर दिया गया.

1952 के बाद शुरू हुआ मंदिर के संरक्षण का अभियान

मंदिर ट्रस्ट के सचिव सह शिक्षक चित्रकूट राम ने बताया कि वर्ष 1952 में पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद तत्कालीन मुखिया यदुनंदन सिंह और सरपंच रामवृक्ष बिंद ने ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर के गुंबद का निर्माण कराया. बाद में सरकारी सेवाकाल में रहे श्रीराम सिंह ने बैजनाथ शिव मंदिर ट्रस्ट का गठन कर मंदिर के संरक्षण और विकास का कार्य शुरू कराया. चंदा एकत्र कर बाउंड्री वॉल का निर्माण कराया गया. निर्माण के दौरान मंदिर परिसर की खुदाई में सुर्खी-चूने का प्राचीन फर्श और नौ हवन कुंड भी मिले, जो इस मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को और मजबूत करते हैं.


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By Sanjay jaiswal

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