ध्वनि प्रदूषण के कारण सुनने की क्षमता हो रही प्रभावित

अरवल में बस, ट्रक और ऑटो के प्रेशर हॉर्न से ध्वनि प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है. सदर अस्पताल की ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. रागिनी रैना के अनुसार, पिछले एक साल में सुनने की क्षमता कम होने और बहरेपन के मरीजों की संख्या में 30% की भारी वृद्धि हुई है. अब प्रतिदिन 40-50 मरीज इस समस्या के साथ ओपीडी में पहुँच रहे हैं.

Arwal News: बस, ट्रक और ऑटो में बजने वाले प्रेशर हॉर्न हाइवे किनारे रहने वाले और यात्रा करने वाले लोगों की सुनने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं. जिले के दोनों एनएच 33 और 139 के किनारे रहने वाले लोग प्रेशर हॉर्न के कारण कान की समस्या लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं. सदर अस्पताल के ईएनटी विभाग की डॉ. रागिनी रैना के अनुसार, बीते एक साल में बहरेपन और कम सुनने की समस्या लेकर आने वाले मरीजों की संख्या में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

एक दिन में 40 से 50 मरीज पहुंच रहे ओपीडी

डॉ. रागिनी रैना ने बताया कि एक साल पहले प्रतिदिन 10 से 15 लोग कम सुनाई देने की शिकायत लेकर पहुंचते थे. अब प्रतिदिन ओपीडी में 40 से 50 मरीज बहरेपन या कम सुनने की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. उन्होंने इसका प्रमुख कारण ध्वनि प्रदूषण को बताया. सड़कों पर बजने वाले प्रेशर हॉर्न से कम सुनने की समस्या बढ़ रही है.

प्रेशर हॉर्न से कान के पर्दे पर पड़ता है दबाव

ईएनटी विशेषज्ञ ने बताया कि प्रेशर हॉर्न बजने से कान के पर्दे पर अचानक तेज दबाव पड़ता है. इससे कान के पर्दे के पीछे रहने वाली हड्डियां भी कमजोर हो रही हैं. ऐसे मरीज लगातार अस्पताल पहुंच रहे हैं. प्रेशर हॉर्न के बीच लगातार रहने से धीरे-धीरे बहरेपन की समस्या और कान में सीटी की आवाज सुनाई देने लगती है. कान बहने की शिकायत भी सामने आ रही है. कान में चोट लगने से भी व्यक्ति बहरेपन का शिकार हो सकता है.

बच्चों में भी कान बहने की समस्या

डॉ. रागिनी रैना ने बताया कि ध्वनि का स्तर सामान्य रूप से 20 से 40 डेसीबल तक होना चाहिए. बच्चों में कान बहने की समस्या रहती है. इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और देर किए बिना विशेषज्ञ चिकित्सक को दिखाना चाहिए. समय पर उपचार शुरू होना बेहद जरूरी है.

उन्होंने बताया कि बहरेपन की समस्या अनुवांशिक भी होती है. ऐसे मामलों में सर्जरी कर कान में कोक्लियर इंप्लांट नामक मशीन लगाई जाती है. पांच वर्ष की आयु से पहले कोक्लियर इंप्लांट लगने पर कुछ हद तक सुनाई देने लगता है.

कान में चोट और दवाओं के इस्तेमाल से भी हो सकती है समस्या

ईएनटी डॉ. रागिनी रैना के अनुसार, कान में चोट लगने से भी व्यक्ति बहरेपन का शिकार हो सकता है. इसके अलावा आटोटॉक्सिक दवाओं के प्रयोग से भी सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. ऐसी दवाओं का इस्तेमाल टीबी आदि बीमारियों में किया जाता है. उन्होंने बताया कि अधिक ध्वनि भी सुनने की क्षमता प्रभावित होने के प्रमुख कारणों में से एक है.

किशोर और युवा भी हो रहे प्रभावित

डॉ. रागिनी रैना ने बताया कि ध्वनि प्रदूषण के कारण कम उम्र के लोगों में भी कम सुनाई देने की समस्या सामने आ रही है. पहले यह समस्या बुजुर्गों में अधिक देखने को मिलती थी, लेकिन तेज आवाज में गाना सुनने और हेडफोन के अधिक इस्तेमाल के कारण 18 वर्ष की उम्र के लोग भी कम सुनाई देने की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. हर दिन 40 से अधिक मरीज सुनने की समस्या लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं.


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By Nishikant kumr

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