कुव्यवस्था . एसएनसीयू के आगे खुले में रात गुजारने को विवश हैं माताएं
मंगलवार की देर शाम सदर अस्पताल में एसएनसीयू (विशेष नवजात देखभाल इकाई) के आगे खुले में कई माताएं ठंड से ठिठुर रही हैं. ये अपने नवजात का इलाज कराने अस्पताल पहुंची हैं. ठंड की रात में ये ममता का कड़ा इम्तिहान दे रही हैं. ठंड में मासूम की जान बचाने को खुद की जिंदगी को दावं पर लगा बैठी हैं कई ‘मां’.
जहानाबाद : ममत्व का जीवन प्रस्तुत करने वाली बॉलीवुड की फिल्मों से इतर जहानाबाद सदर अस्पताल में कई बेबस मांं अपने जिगर के टुकड़े की सलामती के लिए इस हाड कंपा देने वाली ठंड में खुद को गला रही हैं. मासूम की जान बचाने को ममता का ऐसा कड़ा इम्तिहान की हड्डी भेदने वाली कनकनी में भी वह आसमान के नीचे रात काटने को विवश हैं. चोखा-भात खाकर सर्दी से जंग लड़ रही लाचार मां किसी भी सूरत में नवजात को भला-चंगा कर घर ले जाना चाहती हैं.
भले ही उसकी जिंदगी दावं पर क्यों न लग जाये? शिशु वार्ड के बेड नंबर नौ पर जुड़वा बच्चे (लड़का-लड़की) इलाजरत हैं .मखदुमपुर प्रखंड क्षेत्र के पंचवई गांव से अपने मासूमों का इलाज कराने पहुंची पिंकी खुद बीमार हैं. इन जुड़वा बच्चों के साथ-साथ मां का भी इलाज सदर अस्पताल में चल रहा है. पिंकी की सास कुंती देवी कहती है कि घर में ही पतोहू का प्रसव समय से पहले करीब सात माह में हो गया था.जुड़वा बच्चा पैदा हुए, लेकिन दोनों की स्थिति काफी नाजुक थी.
वजन कम था, जिसके कारण पतोहू के साथ सात दिनों से यहीं खुले आसमान के नीचे बच्चों की सलामती के लिए रात कट रही है. रहने की व्यवस्था के बाबत कुंती कहती हैं कि अस्पताल में मदर वार्ड तो बना है लेकिन यहां महज चार बेड हैं. हम बेबस और लाचार हैं. इतने पैसे भी नहीं कि किसी रेस्ट हाउस में रात गुजार सकें. बच्चों को दूध पिलाने की खातिर मां का यहां होना जरूरी है.
मगर खुले में रात गुजारने से अभी वह भी बीमार है. वहीं एसएनसीयू के ठीक सामने वाले बरामदे पर झुनझुन देवी और उसकी बेटी -पतोहू पुआल बिछा कर बैठी हैं. बरामदे में बैठी रूबी भी अपने बच्चे का तीन दिनों से इलाज कराने पहुंची है, जो चोखा -भात खाकर खुले में रात गुजार रही है. इसकी तबीयत भी सुस्त है. कहती है क्या करूं, किसी तरह मेरा लाल जल्दी ठीक हो जाये. हालांकि बाहर खुले में रह रही कई माताओं ने बताया कि बच्चे की तबीयत से तेजी से सुधार हो रहा है. यहां के कर्मी और डॉक्टर लगातार बच्चों का ख्याल रखते हैं.
इनसे कोई शिकायत नहीं. हां, इतना जरूर कहूंगी कि अगर मदर वार्ड में भी बेडों की संख्या बढ़ा दी जाती या आस-पास टेंट-शामियाना भी लगा दिया जाता, तो सहूलियत होती और हमलोगों की सेहत भी ठीक रहती.
क्या कहते हैं अधिकारी
माताओं के लिए खान-पान की अस्पताल प्रबंधन की ओर कोई व्यवस्था नहीं है. नवजातों की देखभाल के लिए व्यवस्था है. शिशुओं के इलाज के लिए 14 बेड हैं, जिनमें एक खराब है बाकी के सारे बेड पर नवजातों का इलाज चल रहा है. इस इकाई में अधिकतम 28 दिनों तक के बच्चों का इलाज होता है. सुधार नहीं होने की स्थिति में बच्चों को पटना भी रेफर किया जाता है.
डाॅ ब्रजभूषण प्रसाद, एसएनसीयू प्रभारी
शिशु वार्ड में भरती हैं 13 मासूम, वहीं मदर वार्ड में हैं महज चार बेड
खुले में बैठीं अस्पताल में भरती बच्चाें की माताएं. एसएनसीयू में भरती बच्चे.
