कानून के बाद भी भ्रूणहत्या पर नहीं लग पा रही रोक

जहानाबाद : कहा जाता है कि बेटे भाग्य से होते हैं और बेटियां सौभाग्य से होती हैं. बेटियों की किलकारी के बिना घर-आंगन को अधूरा मान जाता है. बदलते जमाने में ऑटो से लेकर ट्रेन, प्लेन से लेकर अंतरिक्ष यान तक चला रही हैं बेटियां. रविवार को भारत में बेटी दिवस मनाया गया. फेसबुक से […]

जहानाबाद : कहा जाता है कि बेटे भाग्य से होते हैं और बेटियां सौभाग्य से होती हैं. बेटियों की किलकारी के बिना घर-आंगन को अधूरा मान जाता है. बदलते जमाने में ऑटो से लेकर ट्रेन, प्लेन से लेकर अंतरिक्ष यान तक चला रही हैं बेटियां. रविवार को भारत में बेटी दिवस मनाया गया. फेसबुक से लेकर व्हाट्सएप तक सोशल मीडिया पर बेटियों के प्रति स्नेह, प्यार और गर्व भरे संदेश और लेख छाये रहे.

वहीं 28 सितंबर को विश्व बेटी दिवस मनाया जायेगा, तब तक पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में बेटियों की ऊंची उड़ानों पर लंबे-लंबे लेख लिखे जायेंगे, लेकिन बिहार के अधिकतर जिलों में हकीकत कुछ अलग ही है. बिहार में प्रति हजार पुरुषों पर 916 महिलाएं हैं.
वहीं जहानाबाद जिला महिला-पुरुष अनुपात के मामले में राज्य में 17वें स्थान पर है. 2001 की जनगणना में यह 11वें रैंक पर था. पिछले 10-15 सालों में लिंगानुपात का कम होना यह बताता है कि बेटियां पेट से गायब हो रही हैं.
जहानाबाद की 11 लाख 24 हजार 176 की जनसंख्या में 5 लाख 86 हजार 202 पुरुषों पर 5 लाख 37 हजार 974 महिलाएं हैं. जिले का जन्म दर 32 प्रति हजार है. इन आंकड़ों को बारीकी से देखें तो हर साल कम से कम 700 लड़कियां मां के पेट से ही गायब हो रही हैं. एक आकलन के अनुसार जिले में प्रतिदिन लगभग दो बेटियों की हत्या मां के पेट में ही कर दी जाती है.
36 घंटे और 10 हजार रुपये में हो जाती है ‘सफाई’: मनुष्य आज भले ही चांद और मंगल तक पहुंच गया है, लेकिन सोच अभी भी काफी पिछड़ी हुई और बैलगाड़ी के जमाने की है. बेटों की चाह इस कदर हावी है कि उसके लिए लोग बेटियों को मां के पेट में ही मारने में संकोच नहीं कर रहे हैं. बेटी होने पर खुश होने वाले लोग बहुत कम हैं.
जबकि दुखी होने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है. बेटी की पढ़ाई, दहेज और शादी का खर्च बेटी के जन्म से पहले ही जोड़ लिया जाता है. ऐसे में महज 10 हजार रुपये में ही आने वाले बोझ से छुटकारा पाना ज्यादा आसान ये मां-बाप मानते हैं.
गर्भ में पल रहे भ्रूण का लिंग जांच कराना कानूनन अपराध है. फिर भी बेटे का ही जन्म हो यह तय करने के लिए लोग बेहिचक भ्रूण जांच करवाते हैं. गर्भ के चौथे महीने के बाद ही यह पता चल पाता है कि भ्रूण लड़का है या लड़की. सामान्य अल्ट्रासाउंड का जहां 800-1000 रुपये लिया जाता है, वहीं लिंग जांच के लिए अल्ट्रासाउंड केंद्र 2500-3000 वसूलते हैं.
गर्भ में लड़की होने पर निजी नर्सिंग होम का सहारा लिया जाता है जहां गर्भवती को दवा खिलायी जाती है जो पेट में ही भ्रूण को मार देती है. लगभग 24 घंटे के बाद टुकड़ों में काट-काट कर मृत भ्रूण को बाहर निकाला जाता है. बहुत कम मामलों में साबूत भ्रूण निकलता है.
इसके लिए नर्स लगभग 2500 रुपये और चिकित्सक 4000-5000 रुपये लेते हैं. जैसी पार्टी वैसा दाम का मंत्र भी चलता है. 30-36 घंटे के अंदर महिला को अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है. उस मां को कैसा लगता होगा जिसकी अजन्मी बेटी को उसके ही परिवार वाले और डॉक्टर मिलकर पेट में ही मार डालते हैं और नोंच-नोंच कर निकाल फेंक देते हैं.
पुरुषवादी समाज में महिला अपनी अजन्मी बेटी के लिए हारी हुई लड़ाई लड़कर सिसकती हुई घर पहुंचती है. मुहल्ले के लगभग सभी बड़ी, बूढ़ी महिलाओं को भी पता चल ही जाता है कि इसके पेट से बेटी गायब हो गयी. सुपारी किलिंग का यह खेल बेरोक-टोक शासन-प्रशासन के नाक के नीचे सामाजिक स्वीकृति के सहारे चलता रहता है. न कोई गवाह सामने आता है और न कोई सबूत.
भ्रूण की लिंग जांच है कानूनी अपराध
पीसी एक्ट पीएनडीटी एक्ट के तहत जन्म पूर्व गर्भ की जांच कानूनन अपराध है. यह जांच करने वाले क्लिनिक चिकित्सक और गर्भवती को लिंग निर्धारण परीक्षण के लिए मजबूर करने वाले सभी कानून के दायरे में आते हैं.
इस कानून में डॉक्टर के मेडिकल परमिट रद्द करने से लेकर परीक्षण में शामिल लोगों को तीन वर्ष तक का कारावास भी जाना पड़ सकता है. जहानाबाद में लिंग जांच से संबंधित कोई भी शिकायत अभी तक प्राप्त नहीं हुई है और इस एक्ट के तहत कोई केस दर्ज नहीं है. किसी मामले के जानकारी में आने पर कठोर कार्रवाई की जायेगी.
डॉ विजय कुमार सिन्हा, सिविल सर्जन, सदर अस्पताल, जहानाबाद

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