Jamui Legal Awareness Camp: जमुई. जिला विधिक सेवा प्राधिकार के तत्वावधान में मंगलवार को मंडल कारा स्थित विधिक सेवा केंद्र में बंदियों के बीच विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का संचालन सहायक लीगल एड डिफेंस काउंसिल गोविंद कुमार ने किया. शिविर में बंदियों को पैरोल से संबंधित कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी गई और उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया गया.
पैरोल के नियमों की दी गई जानकारी
शिविर में अधिवक्ता गोविंद कुमार ने बताया कि पैरोल एक अस्थायी अनुमति है, जिसके तहत दोषसिद्ध कैदी को विशेष परिस्थितियों में सीमित अवधि के लिए जेल से बाहर जाने की अनुमति दी जाती है. उन्होंने बताया कि पैरोल मिलने से सजा समाप्त नहीं होती है. निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद बंदी को अनिवार्य रूप से वापस जेल लौटना पड़ता है.
विचाराधीन कैदियों को नहीं मिलती पैरोल सुविधा
अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि पैरोल की सुविधा विचाराधीन कैदियों के लिए नहीं होती है. ऐसे बंदियों को जेल से रिहाई के लिए सामान्य जमानत प्रक्रिया अपनानी होती है. उन्होंने कैदियों को पैरोल और जमानत के बीच के अंतर की भी जानकारी दी.
इन परिस्थितियों में किया जा सकता है आवेदन
Jamui Legal Awareness Camp: शिविर में बताया गया कि परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु, निकट संबंधी की गंभीर बीमारी, विवाह, स्वयं बंदी की गंभीर बीमारी अथवा अन्य मानवीय परिस्थितियों में पैरोल के लिए आवेदन किया जा सकता है. हालांकि पैरोल बंदी का स्वतः अधिकार नहीं है, बल्कि संबंधित नियमों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के आधार पर इसे स्वीकृत किया जाता है.
शर्तों का पालन करना अनिवार्य
अधिवक्ता ने बताया कि विशेष परिस्थितियों में बंदी कारा अधीक्षक के माध्यम से पैरोल के लिए आवेदन कर सकते हैं. पैरोल स्वीकृत होने के बाद बंदी को सभी निर्धारित शर्तों का पालन करना होता है. इस दौरान किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल होना प्रतिबंधित रहता है और तय समय पर जेल वापस लौटना जरूरी होता है.
उल्लंघन पर रद्द हो सकती है पैरोल
उन्होंने बताया कि पैरोल की शर्तों का उल्लंघन करने पर इसे रद्द किया जा सकता है. साथ ही भविष्य में पैरोल मिलने में भी कठिनाई हो सकती है. शिविर के सफल आयोजन में मंडल कारा प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका रही.
