हार्डकोर नक्सली की बेटी ने अपनी सेवा से गांव की बदल दी तस्वीर

जिला जमुई मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर अति पिछड़े आदिवासी बहुल चोरमारा गांव में आज बदलाव की कहानी किसी इमारत या योजना से नहीं बल्कि एक जुझारू बेटी के हौसले से लिखी जा रही है.

शशिलाल,

बरहट

जिला जमुई मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर अति पिछड़े आदिवासी बहुल चोरमारा गांव में आज बदलाव की कहानी किसी इमारत या योजना से नहीं बल्कि एक जुझारू बेटी के हौसले से लिखी जा रही है. आदिवासी समाज से ताल्लुक रखने वाली सोनी कुमारी ने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बीच स्वास्थ्य सेवा को अपना मिशन बना लिया है. गांव में अस्पताल या स्थायी स्वास्थ्य केंद्र नहीं होने के बावजूद वे पिछले डेढ़ साल से स्वास्थ्य वालंटियर के रूप में लगातार सेवाएं दे रही हैं. सोनी अब तक दर्जन भर से अधिक गर्भवती महिलाओं को निशुल्क चिकित्सा सहयोग देकर सुरक्षित प्रसव कराने में अहम भूमिका निभा चुकी हैं. गांव में किसी को चोट लग जाये अचानक तबीयत बिगड़ जाये या प्राथमिक उपचार की जरूरत पड़े तो सबसे पहले सोनी ही मौके पर पहुंचती हैं. उनके पास न तो बड़ी डिग्री है, न आधुनिक उपकरण,लेकिन सेवा का जज्बा और सीखने की लगन उन्हें खास बनाती है.

लाल गलियारों में सोनी कुमारी बनीं जीवन रक्षक

स्थानीय लोगों के अनुसार चोरमारा गांव कभी नक्सल हिंसा, भय और बदहाली का प्रतीक माना जाता था. दशकों तक यह इलाका नक्सलियों के चपेट में रहा. जिसका सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ा. न सड़क, न अस्पताल और न ही बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं. हालात इतने बदतर थे कि गर्भवती महिलाओं को प्रसव पीड़ा होने पर खाट पर लिटाकर 15 किलोमीटर दूर बरहट या 25 किलोमीटर दूर लक्ष्मीपुर अस्पताल ले जाया जाता था. कई बार लंबा सफर और समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण महिलाओं की जान चली जाती थी. इन मंजरों को देखकर गांव की बेटी सोनी कुमारी का मन द्रवित हो उठा और उन्होंने लोगों की सेवा को ही अपना जीवन लक्ष्य बना लिया.सोनी बताती हैं कि उन दर्दनाक घटनाओं ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया.तभी उन्होंने समग्र सेवा के तहत स्वास्थ्य वालंटियर के रूप में काम करने का संकल्प लिया. बिना किसी आधुनिक उपकरण और औपचारिक प्रशिक्षण के भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. आज सोनी 100 से अधिक गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के लिए अस्पताल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा चुकी हैं. उनके प्रयासों से गांव में मातृ मृत्यु दर में भारी कमी आई है.

सोनी की पहल से गांव तक पहुंची पहली सरकारी एंबुलेंस

नक्सल प्रभावित क्षेत्र और कच्ची सड़कों के कारण बरहट प्रखंड मुख्यालय से एंबुलेंस चोरमारा तक नहीं पहुंचती थी. इसी बीच सीआरपीएफ कैंप 215 बटालियन परिसर में आयोजित ग्राम विकास शिविर के दौरान सोनी ने तत्कालीन जिलाधिकारी राकेश कुमार के समक्ष गांव की स्वास्थ्य बदहाली और गर्भवती महिलाओं की पीड़ा को बेबाकी से रखा. जिलाधिकारी के निर्देश पर गांव में पहली बार सरकारी एंबुलेंस पहुंची. इसके बाद से जरूरतमंद महिलाओं को सीधे प्रखंड मुख्यालय स्थित अस्पताल ले जाया जाने लगा.जिससे प्रसव के दौरान होने वाली परेशानियां काफी हद तक खत्म हो गईं.

सेवा व साहस की मिसाल बनी सोनी

खास बात यह है कि सोनी कुमारी हार्डकोर नक्सली अर्जुन कोड़ा की बेटी हैं. लेकिन उन्होंने अपने पिता की पहचान से अलग राह चुनी. उन्होंने हिंसा को त्यागकर सेवा और मानवता का मार्ग अपनाया. आज सोनी न सिर्फ चोरमारा बल्कि आसपास के कई गांवों की प्रेरणा बन चुकी हैं. वे रोजाना चार-पांच गांवों का भ्रमण कर बीपी, शुगर, बुखार जैसी जांच करती हैं .लोगों को बीमारी से बचाव के उपाय बताती हैं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी भी देती हैं.

प्रेम विवाह बना संघर्ष की शुरुआत

ग्रामीणों के अनुसार, सोनी कुमारी ने गांव के ही जितेंद्र कोड़ा से प्रेम विवाह किया था. वर्ष 2020 में नक्सली आतंक के चरम दौर में इस शादी को लेकर गांव में पंचायत हुई और दोनों को गांव से बाहर कर दिया गया. करीब एक वर्ष तक सोनी और जितेंद्र को गांव से दूर रहना पड़ा. बाद में अर्जुन कोड़ा के आत्मसमर्पण के बाद दोनों की गांव में वापसी हुई. गांव लौटते ही सोनी ने पूरे मन से गांव की सेवा शुरू कर दी और आज वही गांव उन्हें सम्मान की नजर से देखता है.

गांव में अब भी सुविधाओं का इंतजार

सोनी बताती हैं कि गांव में अब शांति है और लोग हंसी-खुशी जीवन जी रहे हैं. लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी कई मूलभूत सुविधाओं की अब भी कमी है. गांव में पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की व्यवस्था है. वे चाहती हैं कि सरकार गांव में स्कूल, सड़क और स्वास्थ्य केंद्र जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराए ताकि चोरमारा का भविष्य और उज्ज्वल हो सके.

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