जमुई की चीख और कानून-व्यवस्था के सामने खड़े सवाल

Jamui Incident: जमुई की एक सड़क पर दो नाबालिगों के साथ हुई कथित मारपीट और बदसलूकी ने भीड़तंत्र और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. वायरल वीडियो के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है. अब नजर इस बात पर है कि जांच कितनी तेजी और निष्पक्षता से आगे बढ़ती है.

Jamui Incident: किसी भी समाज में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सिर्फ कानून की किताबों में नहीं, बल्कि सड़कों पर दिखाई देनी चाहिए. बिहार के जमुई से सामने आया मामला इस सवाल को फिर खड़ा करता है. 19 सितंबर की शाम करीब 6 से 7 बजे के बीच कोचिंग से लौट रहे एक किशोर और किशोरी को भीड़ ने घेर लिया और उनके साथ मारपीट और बदसलूकी की.

वीडियो में किशोरी हाथ जोड़कर छोड़ देने की गुहार लगाती दिखाई देती है. वह कहती है कि वे दोबारा वहां नहीं आएंगे. इसके बावजूद कुछ लोग उसके साथ अनुचित तरीके से छेड़छाड़ करते और उसे अपने साथ ले जाने की कोशिश करते नजर आते हैं. उसके साथ मौजूद छात्र को भी थप्पड़ मारे जाते हैं और डराया जाता है.

सोचिए, दो बच्चे कोचिंग से घर लौट रहे हैं. उनके हाथ में किताबें हैं. कुछ देर बाद वही बच्चे सड़क के बीच अपनी सुरक्षा के लिए लोगों से रहम की गुहार लगा रहे हैं. यही इस पूरे मामले की सबसे डराने वाली बात है.

पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है. तीन आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है. वीडियो के आधार पर अन्य लोगों की पहचान की जा रही है.

अब असली परीक्षा आगे है

एफआईआर और गिरफ्तारी जांच की शुरुआत हैं, अंत नहीं. इस मामले में जांच कितनी तेजी से पूरी होती है, कौन-कौन लोग आरोपी बनाए जाते हैं और अदालत में मामला कितनी जल्दी आगे बढ़ता है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण होगा. खासकर तब, जब पीड़िता नाबालिग बताई जा रही है और मामले में पॉक्सो कानून लगाया गया है.

जमुई की ये घटना कानून के इकबाल पर एक सीधा तमाचा है. अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो सहित लागू कानूनों के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और मामले की सुनवाई तेजी से होनी चाहिए. ऐसे मामलों में कानून का असर तभी दिखेगा जब जांच और अदालत की प्रक्रिया दोनों में अनावश्यक देरी न हो.

यहां एक और सवाल है। सड़क पर किसी लड़की या लड़के को घेरने, मारने या डराने का अधिकार आखिर किसी भीड़ को किसने दिया?

किसी अपराध की शिकायत का रास्ता पुलिस और अदालत है। सड़क पर भीड़ का फैसला कानून नहीं हो सकता. अगर लोग खुद ही आरोपी, जांचकर्ता और सजा देने वाले बन जाएं, तो फिर कानून की जरूरत ही क्या रह जाती है?

महिला सुरक्षा की बात सिर्फ भाषणों और अभियानों तक सीमित नहीं रह सकती. इसका मतलब यह भी है कि एक किशोरी शाम को कोचिंग से घर लौटे और रास्ते में उसे अपनी सुरक्षा के लिए हाथ जोड़कर किसी से रहम न मांगना पड़े.

जमुई मामले में अब जांच एजेंसियों और अदालत की कार्रवाई पर नजर रहेगी. जिन लोगों की भूमिका जांच में सामने आती है, उनके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए. और अगर आरोप साबित होते हैं, तो सजा भी उसी कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए. क्योंकि सड़क पर डर किसका होना चाहिए, इसका जवाब बहुत साफ है. आम लोगों का नहीं, कानून तोड़ने वालों का.


एडवोकेट राकेश कुमार सिंह- सीनियर मैनेजिंग पार्टनर, आरकेएस एसोसिएट

लेखक- एडवोकेट राकेश कुमार सिंह- सीनियर मैनेजिंग पार्टनर, आरकेएस एसोसिएट

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