वैशाली में किसान जागरूकता कार्यक्रम, प्राकृतिक खेती अपनाने पर जोर

Hajipur News : खेत भ्रमण में सामने आया सफल मॉडल, बहुफसली जैविक खेती से लाखों की कमाई

हाजीपुर के राजापाकर से नीरज कुमार की रिपोर्ट
Hajipur News : कृषि विज्ञान केंद्र वैशाली एवं आत्मा वैशाली के संयुक्त तत्वावधान में खेत बचाओ अभियान के अंतर्गत ग्राम सिसौनी प्रबोधी, प्रखंड भगवानपुर में किसान जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का मुख्य विषय उर्वरकों का संतुलित उपयोग, प्राकृतिक खेती, जैविक खेती एवं धान की सीधी बुवाई डिएसआर तकनीक रहा है. कार्यक्रम का आयोजन डॉ. अनिल कुमार सिंह, वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान के मार्गदर्शन में तथा कुमारी नम्रता, वैज्ञानिक (कृषि अभियंत्रण) के नेतृत्व में किया गया. किसानों को संबोधित करते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने हेतु संतुलित उर्वरक उपयोग आवश्यक है. साथ ही जैविक एवं प्राकृतिक खेती को अपनाकर खेती को टिकाऊ बनाया जा सकता है. किसानों को जैविक खाद निर्माण विधि की जानकारी दी गई तथा सब्जी फसलों में कीटनाशकों के कम उपयोग हेतु येलो स्टिकी ट्रैप एवं ब्लू स्टिकी ट्रैप के प्रयोग पर बल दिया गया.

30 से 40 प्रतिशत पानी की बचत करेगी डीएसआर तकनीक, किसानों को दी गई जानकारी

वैज्ञानिक के द्वारा बताया  गया कि अल-नीनो  के प्रभाव से उत्पन्न सूखे और कम वर्षा की स्थिति में धान की सीधी बुवाई तकनीक एक महत्वपूर्ण समाधान है. इस विधि में खेत को पानी से लबालब भरने की आवश्यकता नहीं होती. जिससे लगभग 30–40% तक पानी की बचत होती है. मानसून की देरी या कम बारिश की स्थिति में भी केवल मिट्टी की नमी के आधार पर बुवाई संभव है.

अमरूद से सेब तक की खेती, एक एकड़ से 10 लाख की आय ने सबको चौंकाया

इस अवसर पर सुधा कुमारी (सहायक तकनीकी प्रबंधक), पलक प्रियांशु (सहायक तकनीकी प्रबंधक), सुरेश कुमार, आशा देवी, चंदेश्वर प्रसाद राय (वार्ड सदस्य), राजदेव राय (अनुमंडल कृषि पदाधिकारी), अजय कुमार (प्रखंड कृषि पदाधिकारी) सहित अन्य पदाधिकारी एवं  किसान उपस्थित रहे. कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों द्वारा किसानों के खेतों का भ्रमण भी किया गया. भ्रमण के दौरान पाया कि  प्रगतिशील किसान मुकेश कुमार द्वारा एक एकड़ भूमि में विकसित की जा रही बहुफसली जैविक खेती प्रणाली जिसमें अमरूद, अंजीर, कटहल, पपीता, अनार , सेब, एवं अन्य सब्जियों की खेती शामिल थी. उन्होंने बताया कि इस प्रणाली से लगभग 10 लाख रुपये प्रति एकड़  वार्षिक आय प्राप्त हो रही है.

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