Gopalganj News: ममता का रिश्ता समय और बीमारी की धुंध से भी कहीं अधिक मजबूत होता है. जब यादें साथ छोड़ देती हैं, तब भी मां के दिल में औलाद की पहचान जीवित रहती है. ऐसा ही भावुक दृश्य गोपालगंज के फुलवरिया में देखने को मिला, जहां करीब डेढ़ महीने से लापता 80 वर्षीय रामवती देवी आखिरकार अपने बीमार बेटे से मिल गईं. बेटे को देखते ही वह उससे लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ीं. इस भावुक मिलन ने वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें नम कर दीं.
महिलाओं की संवेदनशीलता ने बचाई जान
स्वर्गीय संजय तिवारी की पत्नी रामवती देवी मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं. वह करीब डेढ़ महीने से घर से लापता थीं. इस दौरान वह फुलवरिया रेलवे स्टेशन के किनारे बदहवास हालत में मिलीं. सुबह टहलने निकली गांव की महिलाओं की नजर जब उन पर पड़ी तो उन्होंने मानवता का परिचय देते हुए वृद्धा को अपने घर ले जाकर नहलाया, साफ कपड़े पहनाए और भोजन कराया. कुछ देर आराम करने के बाद जब उनसे बातचीत की गई तो उनकी आंखों में अपने बेटे से मिलने की बेचैनी साफ झलक रही थी. उन्होंने रुंधे गले से कहा, "मुझे घर जाना है, मेरा बेटा मुझे ढूंढ़ रहा होगा."
युवाओं ने तलाशा घर का सुराग
रामवती देवी की याददाश्त कमजोर होने के कारण वह कभी छपरा तो कभी सीवान का नाम बता रही थीं. काफी देर तक बातचीत के बाद उन्होंने हथुआ के बरी देवरिया गांव का जिक्र किया. इसी सुराग के आधार पर गांव के तीन युवाओं अनीश कुमार, संजय कुमार और ब्यास कुमार ने उनकी तस्वीर लेकर बरी देवरिया पहुंचने का निर्णय लिया.
तस्वीर देखते ही पहचान गए ग्रामीण बरी देवरिया पहुंचने पर ग्रामीणों ने तस्वीर देखते ही रामवती देवी की पहचान कर ली. इसके बाद युवाओं ने उनके पुत्र सुकुल तिवारी का मोबाइल नंबर प्राप्त कर संपर्क किया. फोन पर बेटे की भावुक आवाज सुनकर सभी की आंखें भर आईं.
'मैं बीमार हूं... मेरी मां को घर पहुंचा दीजिए'
लकवाग्रस्त सुकुल तिवारी ने फोन पर रोते हुए कहा कि उनकी मां का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है और वह खुद गंभीर रूप से बीमार हैं. उन्होंने युवाओं से निवेदन किया कि यदि संभव हो तो उनकी मां को घर पहुंचा दें. युवाओं ने बिना देर किए एक वाहन रिजर्व किया और रामवती देवी को सुरक्षित उनके पैतृक गांव पहुंचा दिया.
मां-बेटे का मिलन देख नम हो गईं आंखें
घर पहुंचते ही 80 वर्षीय रामवती देवी ने अपने बीमार बेटे को देखते ही पहचान लिया. दोनों एक-दूसरे से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगे. यह भावुक दृश्य देखकर वहां मौजूद ग्रामीण भी अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सके. फुलवरिया के युवाओं की इस पहल ने एक बार फिर साबित कर दिया कि संवेदनशीलता और इंसानियत आज भी समाज में जीवित है.
