Gopalganj Generic Medicine News : गोपालगंज जिले के सदर अस्पताल सहित विभिन्न सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सस्ती जेनरिक दवाओं की जगह महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखे जाने का मामला सामने आया है. इससे गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है.
Gopalganj Generic Medicine News : सरकारी अस्पताल में ब्रांडेड दवाएं लिख रहे डॉक्टर
थावे के बरारी जगदीश गांव निवासी विनोद कुमार की पुत्री रचना कुमारी को लूज मोशन की शिकायत पर सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टर ने जांच के बाद बाहर की ब्रांडेड दवा लिख दी. इसी तरह वार्ड नंबर 22 के राजेश प्रसाद की पत्नी पूनम देवी को भी अस्पताल में दवा उपलब्ध होने के बावजूद बाहर से दवा लेने को कहा गया.
मरीजों को कितनी महंगी पड़ रही हैं दवाएं?
मरीजों का आरोप है कि डॉक्टरों की दवा दुकानों से कथित ‘सेटिंग’ के कारण चार रुपये की दवा 30 रुपये, पांच रुपये की दवा 85 रुपये और छह रुपये की दवा 150 रुपये तक में खरीदनी पड़ रही है. सरकार ने 2023 में जिले के 13 सरकारी अस्पतालों में जन औषधि केंद्र खोले थे, ताकि सस्ती दवाएं उपलब्ध हो सकें, लेकिन इन केंद्रों पर अक्सर सन्नाटा पसरा रहता है.
कैसे चलता है खेल?
सूत्रों के अनुसार कुछ दवा कंपनियां डॉक्टरों को प्रोत्साहित करने के लिए उपहार और टूर पैकेज तक देती हैं. वहीं केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन के महामंत्री रवि कुमार ने भी डॉक्टरों द्वारा जेनरिक दवाएं कम लिखे जाने की बात स्वीकार की है.
एक नजर में- ब्रांडेड बनाम जेनरिक दवाएं
- एंटीबायोटिक सिप्लोफ्लॉक्स: जेनरिक 15 रुपये, ब्रांडेड 120 रुपये
- कृमिनाशक एलबेंडाजोल: जेनरिक 10 रुपये , ब्रांडेड 120 रुपये
- शुगर (मेटफॉर्मिन-एसआर): जेनरिक 11 रुपये , ब्रांडेड 150 रुपये
- शुगर-बीपी (मेटफॉर्मिन + ग्लिमप्राइड 1MG): जेनरिक 18, ब्रांडेड 200 रुपये
- रक्तचाप (रोसुवास्टेटिन)- जेनरिक 25, ब्रांडेड 400 रुपये
- हृदय रोग (क्लोपिडोग्रेल 75MG): जेनरिक 12, ब्रांडेड 100 रुपये
- बीपी (रेमिप्रिल): जेनरिक 20, ब्रांडेड 60 रुपये
- न्यूरोपैथिक दर्द (प्रेगाब्लिन 75MG): जेनरिक 40, ब्रांडेड 140 रुपये
- एलर्जी/सांस (डेफ्लाजाकोर्ट 6MG): जेनरिक 15, ब्रांडेड 50रुपये
ड्रग इंस्पेक्टर का क्या कहना है?
ड्रग इंस्पेक्टर अभय शंकर का कहना है कि जेनरिक और ब्रांडेड दवाओं के असर में कोई खास अंतर नहीं होता. इसके बावजूद मरीजों को महंगी दवाएं खरीदने पर मजबूर होना पड़ रहा है, जो व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है.
