तीनों रूपों में यहां होती भगवान सूर्य की उपासना व आराधना

फल्गु नदी के पश्चिमी तट पर तीन अलग-अलग जगहों पर है भगवान सूर्य की मंदिरें

फल्गु नदी के पश्चिमी तट पर तीन अलग-अलग जगहों पर स्थापित है भगवान सूर्य मंदिरें

नीरज कुमार, गया

पितरों की मुक्ति स्थली व भगवान विष्णु की पावन नगरी गयाजी भगवान विष्णु, मां मंगला गौरी मंदिर शक्तिपीठ व आदि शक्ति भगवान शिव के साथ-साथ आदि काल से ही सूर्य उपासना का प्राचीन व विशिष्ट केंद्र भी रहा है. अंत सलिला फल्गु नदी के पश्चिमी तट पर तीन अलग-अलग जगहों पर भगवान सूर्य की ब्रह्मा, विष्णु व भगवान शिव के रूप में अति प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिनकी पूजा-अर्चना यहां के रहने वाले लोगों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले तीर्थयात्री भी मनोवांछित मनोकामना की प्राप्ति के लिए करते रहे हैं. छठ पूजा में यहां भगवान सूर्य को तीन अलग-अलग पहर में सूर्य मंदिरों में अर्घ दान किये जाने की मान्यता काफी पौराणिक रही है. यह परंपरा आज भी पूरी आस्था के साथ जीवंत हो रहा है. इतिहास विद डॉ राकेश कुमार सिन्हा रवि ने बताया कि सूर्य पूजन की परंपरा को समृद्ध बनाने में यहां के तीन तीर्थ का अपना महत्व है जो आदित्य हृदय स्तोत्र के वर्णित तथ्य के अनुरूप है.

प्रातःकालीन ब्रह्म रूप में पिता महेश्वर उत्तरायण सूर्य मंदिर

सूर्यनारायण प्रातःकाल में ब्रह्मा जी के रूप में मध्याह्न काल में शिव महेश्वर के रूप में तो अस्त काल में भगवान विष्णु के रूप में जगत जीवन प्रदान करते हैं. प्रातःकालीन ब्रह्म रूप में पिता महेश्वर उत्तरायण सूर्य मंदिर की महत्ता रही है़ ब्राह्मणी घाट स्थित सूर्य मंदिर में भगवान सूर्य शिव रूप में विराजमान हैं. यहां अपराह्न कालीन भगवान सूर्य पूजन की परंपरा रही है. यहां सूर्य देवता बिरंची नारायण के नाम से प्रसिद्ध हैं जो एकाश्म पाषाणखंड की बनी उनकी पत्नी उषा व प्रत्यूषा के साथ पुत्र शनि व यम के साथ अंकित है. यहां के द्वादश सूर्य तीर्थ व काल भैरव का अपना अलग महत्व है. मंदिर के पुजारी पंडित मनोज मिश्र के अनुसार प्रथम सतयुग कल में ब्रह्मा द्वारा इस मंदिर की स्थापना की गयी थी. वहीं, सूर्यकुंड के सामने दक्षिणार्क सूर्य तीर्थ स्थान है. यहां भगवान सूर्य विष्णु रूप में विराजमान हैं. यहां सायं कालीन भगवान सूर्य की पूजन व अर्घ दान का विधान प्राचीन काल से रही है.

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By NIRAJ KUMAR

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