विलुप्त हो रही प्रजातियों को बचाने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन जरूरी

गया न्यूज : सीयूएसबी में विलुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण के लिए विशेष व्याख्यान आयोजित

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सीयूएसबी में विलुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण के लिए विशेष व्याख्यान आयोजित

स्मिथसोनियन कंजर्वेशन बायोलॉजी इंस्टीट्यूट अमेरिका के डॉ बुधन पुकाझेंथी ने दिया व्याख्यान

वरीय संवाददाता, बोधगया.

विलुप्ति और संरक्षण पारिस्थितिकी तंत्र की दो महत्वपूर्ण गतिशीलताएं हैं. विलुप्त होने से किसी प्रजाति को बचाने के लिए केवल उनकी बहुतायत बढ़ाना और उनकी रक्षा करना ही नहीं है, बल्कि शिकार से लेकर शिकारियों तक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाये रखना भी एक पहलू है. इसी संदर्भ में सीयूएसबी के अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) सेल और आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन सेल (आइक्यूएसी) की ओर से छठी विलुप्ति प्रजातियों के संरक्षण के लिए कौन सी तकनीक सार्थक हैं, पर एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया. कुलपति प्रो कामेश्वर नाथ सिंह के संरक्षण में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत जीवन विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो राम प्रताप सिंह के स्वागत भाषण से और मुख्य अतिथि स्मिथसोनियन कंजर्वेशन बायोलॉजी इंस्टीट्यूट, यूएसए के प्रसिद्ध रिसर्च फिजियोलॉजिस्ट (अनगुलेट्स) डॉ बुधन पुकाझेंथी के परिचय से हुई. पीआरओ मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि इस अवसर पर डॉ बुधन पुकाझेंथी के साथ विशिष्ट अतिथि के रूप में गया के वन संरक्षक एस सुधाकर भी उपस्थित थे.

प्राकृतिक प्रजनन 95 प्रतिशत सफलता दर के साथ सबसे अच्छा तरीका है

डॉ पुकाझेंथी ने वैश्विक खुर वाले जानवरों के संरक्षण कार्यक्रम, प्रजातियों की वैश्विक जैव विविधता स्थिति, माउंटेन टेपिर, व्हाइट राइनो, बाइसन और कई अन्य लाल-सूचीबद्ध प्रजातियों पर चल रहे संरक्षण प्रयासों के साथ-साथ प्राकृतिक प्रजनन की चुनौतियों पर चर्चा की. उन्होंने जैव बैंकिंग, शुक्राणु बैंकिंग, कृत्रिम गर्भाधान, क्लोनिंग जैसे पशु प्रजातियों के प्रबंधन के लिए विभिन्न उपकरणों के उपयोग और संरक्षण कार्यक्रम को क्रियान्वित करने में जीनोमिक्स की भूमिका पर भी बात की. डॉ पुकाझेंथी की टीम कृत्रिम गर्भाधान का उपयोग करके फारसी ओनेगर और प्रेजवाल्स्की के घोड़े के बच्चों को सफलतापूर्वक पैदा करने वाली दुनिया की पहली टीम थी. उन्होंने टिप्पणी की कि प्राकृतिक प्रजनन 95 प्रतिशत सफलता दर के साथ प्रजनन का सबसे अच्छा तरीका है. निष्कर्ष में उन्होंने वर्तमान में हम जो प्रजातियों में महत्वपूर्ण नुकसान देख रहे हैं, उस पर प्रकाश डाला और नीतिगत निर्णयों को निर्देशित करने के लिए पर्यावरण, स्वास्थ्य और जोखिमों को बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने पक्षियों, सरीसृपों और उभयचरों पर अधिक अध्ययन करने पर जोर दिया. उन्होंने भविष्य में अमेरिका में शोध के अवसरों और विभिन्न फेलोशिप के लिए संकायों व शोधार्थियों के साथ बातचीत भी की.

व्याख्यान में 200 से अधिक छात्र, शोधार्थी और संकाय सदस्य रहे मौजूद

इस अवसर पर आइक्यूएसी के समन्वयक प्रो बुधेंद्र कुमार ने विश्वविद्यालय में इस तरह के संरक्षण कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक और मानवीय स्वभाव विकसित करने की दिशा में सेल के योगदान के बारे में बताया. आरएंडडी सेल के निदेशक प्रो दुर्ग विजय सिंह ने भी ऐसे संरक्षण प्रयासों के बारे में अपने विचार व्यक्त किये और श्रोताओं को ऐसे संरक्षण कार्य में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया. इस कार्यक्रम का समापन सीयूएसबी के कंप्यूटर विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो प्रभात रंजन के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ. इस दौरान जीवन विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, जैव सूचना विज्ञान, भूविज्ञान, पर्यावरण विज्ञान, भौतिकी, रसायन विज्ञान, फार्मेसी और कंप्यूटर विज्ञान विभागों के 200 से अधिक छात्र, शोधार्थी और संकाय सदस्य मौजूद रहे.

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Published by: Kalendra pratap singh

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