भारतीय विद्वत् परिषद् मगध इकाई के तत्वावधान व डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी के संयोजकत्व में ग्यारह दिवसीय संस्कृत दिवस का भव्य समापन समारोह संस्कृत एकादशी के रूप में रविवार को रमना स्थित धर्म सभा भवन में धर्मसभा के साथ संपन्न हुआ.
इस अवसर पर संस्कृत के प्रचार-प्रसार, इसकी जीवंतता और जनमानस में इसके पुनरुत्थान पर गहन मंथन किया गया. समारोह की अध्यक्षता दया प्रकाश सरस्वती विद्या मंदिर के प्राचार्य सत्यशेखर राय ने की, जबकि उद्घाटन दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के वाणिज्य संकायाध्यक्ष डॉ बृजेश कुमार ने दीप प्रज्वलित कर किया.
समाजसेविका उषा डालमिया द्वारा सभी विद्वानों व शिक्षाविदों को अंगवस्त्र एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया. कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र नचिकेता वत्स ने किया.
संस्कृत को बताया ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक संदर्भों की सबसे उपयुक्त भाषा
इस मौके पर जन मानस में संस्करत की स्थापना विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी. उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ बृजेश कुमार ने पश्चिमी देशों में लैटिन भाषा के इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि संस्कृत हमारी जन्मभूमि की भाषा है, जिससे अनगिनत ज्ञान और भाषाएं निकली है.
उन्होंने कंप्यूटर विज्ञान और आधुनिक मनोविज्ञान के संदर्भ में भी संस्कृत को सबसे उपयुक्त और संक्षिप्तीकरण की क्षमता वाली भाषा बताया.
विशिष्ट अतिथि एवं दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी संकाय के प्राध्यापक डॉ कर्मानंद आर्य ने कहा कि जिस समाज का वर्तमान नहीं होता, वह अतीत के सहारे जीता है और संस्कृत के पास गौरवशाली अतीत के साथ-साथ एक मजबूत वर्तमान भी है.
घरों में बच्चों को संस्कृत और श्लोक सिखाने का दिया गया सुझाव
महिला महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ शशिभूषण मिश्र ने कहा कि जिस तरह अन्य भाषाओं में बच्चा जन्म से ही सुनकर बोलना-लिखना सीख लेता है उसी प्रकार घर में ही बच्चों को संस्कृत और संस्कृति सिखाया जाना चाहिए.
साहित्यकार डॉ रामकृष्ण मिश्र ने सुझाव दिया कि बच्चों को घरों में ही सरल संस्कृत और श्लोक सिखाए जाये तथा सप्ताह में कम से कम एक दिन ''संस्कृत दिवस'' के रूप में मनाते हुए घरों में संस्कृत में संवाद करने की प्रवृत्ति बढ़ाई जाये.
वरीय साहित्यकार डॉ रामसिंहासन सिंह ने जनमानस में संस्कृत की सरल भाषा में पुस्तकें प्रकाशित एवं प्रसारित करने पर जोर दिया, वहीं पुण्यार्क जी ने युवाओं और विद्यार्थियों को इस संस्कृति से जोड़ने की वकालत की.
संस्कृत को जीवन और जीविका का आधार बनाने की कही गई बात
अनुग्रह कॉलेज के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ उमाशंकर सिंह ने अतीत और वर्तमान के सेतु को मजबूत करने की बात कही, जबकि डीपीएस के हिंदी विभागाध्यक्ष देवेंद्र कुमार पाठक ने पूजा-पाठ से जुड़े आचार्यों को संस्कृत का सच्चा संवाहक बताया.
दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत संकायाध्यक्ष प्रो रोशन मौर्य ने संस्कृत को ''इकोनॉमी और इकोलॉजी'' दोनों दृष्टियों से उपयोगी बताते हुए इसे जीवन और जीविका का आधार करार दिया.
राजा भोज के काल को याद कर समाज के हर वर्ग की भाषा बताने का आह्वान
इस कार्यक्रम के आयोजक डॉ सच्चिदानंद प्रेमी ने राजा भोज के काल का स्मरण कराते हुए कहा कि संस्कृत केवल विद्वानों की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की भाषा रही है. इसका साहित्य तो बहुत विशाल है हि ,इसका व्याकरण इसे और अधिक समृद्ध बनाता है.
अध्यक्षीय भाषण में आचार्य सत्य शेखर राय ने कहा कि कुछ बाधाओं के बावजूद संस्कृत आज भी जन-जन के मन में रची-बसी है. धन्यवाद ज्ञापन जिला स्कूल के पूर्व प्राचार्य डॉ सुदर्शन शर्मा ने की.
