‘पिंडदानी के स्वागत में हम हैं आंख बिछाए’, गया जी में काव्य संध्या 630 में पितृपक्ष पर सुनाई कविता

गया जी के आजाद पार्क में 'काव्य संध्या 630' का शानदार आयोजन हुआ, जहाँ प्रख्यात साहित्यकारों ने अपनी दिलकश कविताओं और गजलों से समां बांधा. इस साहित्यिक उत्सव में सामाजिक सरोकारों से लेकर हास्य-व्यंग्य तक, हर विषय पर रचनाएँ प्रस्तुत की गईं.

गया जी के आजाद पार्क स्थित जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन भवन में शनिवार को 'काव्य संध्या 630' का भव्य आयोजन किया गया. इस साहित्यिक कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार सुरेन्द्र सिंह 'सुरेंद्र' ने की, जबकि मंच का कुशल संचालन सहज कुमार द्वारा किया गया. इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बज्मे राही के सदर जनाब गुफरान अशरफी विशेष रूप से उपस्थित रहे.

काव्य संध्या का विधिवत शुभारंभ चंद्रदेव प्रसाद केशरी द्वारा प्रस्तुत गणेश वंदना से हुआ. उन्होंने अपनी वंदना में उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि "सुमिरौ हे गजानन उमा सुतम." इसके बाद कार्यक्रम में एक से बढ़कर एक रचनाकारों ने अपनी कविताओं और गजलों से श्रोताओं का मन मोह लिया.

कवियों की कविताओं से गूंजा सभागार

  • बिपन बिहारी ने अपनी गजल के माध्यम से सामाजिक सच्चाई को रखते हुए गाया कि "लाखों दीए जलाए गए उनके सालगिरह के जश्न में, मगर दीए के तले अब भी अंधेरा दिखाई देता है."
  • डॉ. निरंजन श्रीवास्तव ने कहा कि "नमन वंदन कर रहे हैं हम विघ्न विनाशक गणेश की."
  • डॉ. राम परिखा सिंह ने पितृ पक्ष के संदर्भ में अपनी पंक्तियां साझा करते हुए कहा कि "पिंडदानी के स्वागत में हम हैं आंख बिछाए."
  • डॉ. मुरली मनोहर पांडेय ने हास्य-व्यंग्य से भरपूर कविता 'बहुरानी की डिग्री' सुनाते हुए सबको हंसाया, जिसमें उन्होंने कहा कि "ऐसा चक्कर चलाई मेरी सास ने कि एमए की डिग्री धारी रह गयी."
  • नरेन्द्र सिंह ने प्रशासनिक व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कहा कि "बाढ़ में बहार है कैसा प्रशासन कैसी सरकार है."
  • खालिक हुसैन परदेसी ने दर्द बयां करते हुए कहा कि "हर सिम्त आंसुओं का समंदर है क्या करें, कितना लहूलुहान ये मंजर है क्या करें."
  • मुख्य अतिथि गुफरान अशरफी ने अपनी शायरी में कहा कि "अशरफी सांस आखिरी है मेरी, अब सवाल-जवाब मत पूछो."

इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए चन्द्रशेखर सिंह ने "बेटे-बेटी दोनों एक ही मां की संतान" कहकर लैंगिक समानता का संदेश दिया. सुमन विश्वकर्मा 'विकल' ने अपने संस्कार गीत में गाया कि "दादी-नानी देवी-दुर्गा, माय-मौसी भारती." नन्द किशोर सिंह ने ताल और नृत्य की फुहार बिखेरते हुए कहा कि "थप थप थप ताल मृदंगा थिरक थिरक नृत्य बहुरंगा, आओ हम सब मिलकर गाएं आज उतारें आरती."

ओजस्वी रचनाएं और समापन

कार्यक्रम के दौरान डॉ. प्रकाश गुप्ता ने देश की शान में कविता पाठ करते हुए कहा कि "जय हो देश महान, हमें आंबेडकर पर शान."

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जनार्दन प्रसाद सिंह ने गहरी दार्शनिक बात रखते हुए कहा कि "सत्य को कहने के लिए किसी शपथ की जरूरत नहीं होती, नदियों को बहने के लिए पथ की जरूरत नहीं होती." वहीं शंकर प्रसाद ने दानवीर राजा शिवी की पौराणिक कथा को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया.

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इनके अलावा अरुण हरलीवाल, बिनोद बरबिगहिया, अरबिंद कुमार, अजीत कुमार, शाहिद जैक, किशन कुमार और बैजू सिंह ने भी अपनी बेहतरीन रचनाएं पढ़कर श्रोताओं की वाहवाही लूटी. कार्यक्रम के अंत में संस्था के महामंत्री सुमंत ने उपस्थित सभी साहित्य प्रेमियों और कवियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया.

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By नीरज कुमार

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