हिंदी ही करायेगी वैश्विक ताकतों के बीच संधि : प्रो आतिश पराशर

सीयूएसबी में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया

सीयूएसबी में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया

वरीय संवाददाता, बोधगया.

हिंदी पखवारे के तहत दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) में विश्व भाषा के रूप हिंदी की संभावनाएं एवं चुनौतियां विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कुलपति प्रो कामेश्वर नाथ सिंह के संरक्षण में सीयूएसबी और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने राजभाषा हिंदी पर अपने विचार प्रस्तुत किये. पीआरओ मोहम्मद मुदस्सीर आलम ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के विशेष कार्य पदाधिकारी (ओएसडी) प्रो आरके सिंह ने की, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के भारतीय भाषा मंच के राष्ट्रीय संयोजक डॉ राजेश्वर कुमार शामिल हुए. दीप प्रज्वलन के बाद कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया गया. स्वागत भाषण देते हुए जनसंचार विभाग के प्राध्यापक प्रोफेसर डॉ आतिश पाराशर ने कहा कि हिंदी को सिर्फ एक भाषा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसमें असीम संभावनाएं हैं. हिंदी वह भाषा है, जो वैश्विक ताकतों के बीच संधि करवाने की ताकत रखती है और इसीलिए आज पूरा विश्व भारत की ओर देख रहा है. हिंदी हमारे संवाद का माध्यम है, हिंदी हमारी मां और मातृभाषा है. अतः मां और मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं होता. मुख्य वक्ता डॉ राजेश्वर कुमार ने कार्यक्रम के विषय पर शानदार अभिव्यक्ति दी. डाॅ राजेश्वर ने कहा कि हिंदी केवल भाषा नहीं अपितु यह हमारे भारत की समृद्ध परंपरा की पहचान है. हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और सांस्कृतिक एकता की पहचान है. उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे हिंदी को मात्र संवाद का माध्यम न मानकर इसे ज्ञान-विज्ञान, साहित्य और तकनीक की भाषा के रूप में आत्मसात करें. उन्होंने हिंदी को परिवार, संस्कार और संवाद के रूप में जोड़कर देखने को कहा.

मातृभाषा के बिना बौद्धिक और भावनात्मक विकास अधूरा

श्री राजेश्वर ने मध्यप्रदेश सरकार की सराहना करते हुए कहा कि हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के शुल्क में कटौती कर हिंदी के प्रति सरकार की निष्ठा स्वागत योग्य है. विश्वविद्यालय के विशेष कार्य अधिकारी डॉ आरके सिंह ने कहा कि अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है, परंतु मातृभाषा के बिना बौद्धिक और भावनात्मक विकास अधूरा है. इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे.

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By KALENDRA PRATAP SINGH

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