गया जी जिले के जगजीवन महाविद्यालय के डॉ फागुनी राम सभागार में हिंदी विभाग द्वारा 'डिजिटल युग में हिंदी की भूमिका' विषय पर एक दिवसीय व्याख्यान का आयोजन किया गया. स्वागत वक्तव्य देते हुए कार्यक्रम के संयोजक डॉ प्रदीप कुमार ने कहा कि डिजिटल युग में हिंदी के सामने चुनौतियां एवं संभावनाएं दोनों हैं.
हिंदी एक लचीली भाषा है जो वैश्विक स्तर तक पहुंच गई है, लेकिन देवनागरी लिपि के समाप्त होने का संकट आ खड़ा हुआ है क्योंकि लोग रोमन लिपि में लिखना शुरू कर चुके हैं.
एआई और मानवीय हस्तक्षेप पर चर्चा
एमयू हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ परम प्रकाश राय ने कहा कि डिजिटल युग में आवाज आगे हो जाएगी और लेखन छूट जाएगा.
उन्होंने एआई के दौर में मानवीय हस्तक्षेप और संवेदनाएं बनाए रखने पर जोर दिया. डॉ अनुज कुमार तरुण ने कहा कि यह विषय भारत के भविष्य से जुड़ा है और डिजिटल माध्यम से हिंदी का विस्तार बढ़ा है.
रोजगार व अर्थव्यवस्था की भाषा
डॉ राकेश कुमार रंजन ने कहा कि हिंदी केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर डिजिटल मंचों और सिनेमा के माध्यम से रोजगार, आर्थिक व सामाजिक भाषा के रूप में उभर रही है, हालांकि तकनीकी क्षेत्र में अंग्रेजी का प्रभाव अभी भी चुनौती है. सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ राम सिंहासन सिंह ने हिंदी को भारत की आत्मा व संस्कृति बताया.
डिजिटल मंचों पर सशक्त उपस्थिति
पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ इंद्रदेव प्रसाद यादव ने कहा कि हिंदी डिजिटल अर्थव्यवस्था की भाषा बन गई है. विभागाध्यक्ष डॉ संगीता कुमारी ने कहा कि चैट जीपीटी और डीप सीक जैसे एआई माध्यमों से हिंदी अपनी भूमिका बढ़ा रही है, लेकिन इसके साथ ही मानवीय संवेदनाएं शुष्क होने का खतरा और भाषा की चुनौती भी बढ़ रही है.
किताबों की उपयोगिता बनी रहेगी
अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रधानाचार्य डॉ मोहम्मद ऐयूब ने कहा कि डिजिटल युग की खामियों के बावजूद किताबों की उपयोगिता हमेशा बनी रहनी चाहिए, क्योंकि हिंदी के बिना हिंदुस्तान की जुबान नहीं समझी जा सकती. डॉ शिवकुमार रविदास ने धन्यवाद ज्ञापन किया और संचालन रश्मि प्रसाद ने किया. मौके पर प्रो पूर्णेंदु कुमार, डॉ अनुरानी, डॉ हिमांशु कुमार सुधांशु, डॉ पूनम कुमारी, डॉ संगीता कुमारी, डॉ राजीव रंजन और डॉ नारायण कुमार सहित कई शिक्षक व छात्र मौजूद थे.
