Gaya ji News : जिला अतिथि गृह सभागार में मंगलवार को भाजपा पूर्वी कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई. बैठक में भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं और पौराणिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने पर विस्तार से चर्चा हुई.
बैठक के मुख्य अतिथि बिहार विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है. किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, परंपराओं, मूल्यों और विरासत से होती है.
बिहरी भारत की सांस्कृति धुरी है : विधानसभा अध्यक्ष
उन्होंने कहा कि बिहार भारत की सांस्कृतिक धुरी है और गया इसकी गौरवशाली पहचान का प्रमुख केंद्र है. गया की धरती धार्मिक आस्था, शिल्प कला और पौराणिक धरोहरों से समृद्ध है. यहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अस्थि कलश सुरक्षित रखा गया है. मूंगा से निर्मित भगवान गणेश की प्रतिमा और स्फटिक शिवलिंग जैसी दुर्लभ धार्मिक धरोहरें इसकी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण हैं.
युवा पीढ़ी को जोड़ने पर मंथन
डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि हाल ही में गया की शिल्प कला को मिला जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग पूरे जिले और राज्य के लिए गौरव का विषय है. इससे स्थानीय शिल्पकारों को नई पहचान और प्रोत्साहन मिलेगा.
बैठक की अध्यक्षता भाजपा पूर्वी कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ के संयोजक अशोक गुप्ता ने की. इस अवसर पर मुन्नीलाल, विकास कुमार, करुणा सिंह, सुधीर शर्मा, ऋषभ राज, शंभू प्रसाद, रंजन यादव, सुमित गुप्ता, पिंटू कुमार, रामेश्वर पासवान, ललन चंद्रवंशी, कमलकांत आनंद, बबलू कुमार, दयानंद चंद्रवंशी, विक्की कुमार, धीरज कुमार, धीरेंद्र धीरू, सचिन ठाकुर सहित कई पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने के लिए जनजागरण अभियान
डॉ प्रेम कुमार ने भाजपा कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ के कार्यकर्ताओं से गया जी की गौरवशाली सांस्कृतिक व पौराणिक धरोहरों का व्यापक प्रचार-प्रसार करने तथा युवाओं को भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं व सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने के लिए जनजागरण अभियान चलाने का आह्वान किया. डॉ प्रेम कुमार ने कहा कि कला व संस्कृति का संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है. नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए खेल विभाग की तर्ज पर ''एकलव्य गुरु-शिष्य परंपरा'' के माध्यम से कलाकारों को जोड़ने की आवश्यकता है.
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