Darbhanga News: नवेंदु, दरभंगा. जीवन के बहुविध रंगों को समेटे फाग गायन से नयी पीढ़ी का नाता टूटता जा रहा है. पारंपरिक होली गीतों के लिए अब कान तरसते रहते हैं. सरस फाग के बोल कानफोड़ू फूहड़ गीतों के शोर में गुम होते जा रहे हैं. इससे मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की यह डोर कमजोर पड़ती जा रही है. इसने संस्कृति स्नेहियों को चिंतित कर रखा है.
वसंत पंचमी से रही है फाग गायन की परंपरा
मिथिला में रंगों के त्योहार होली को लेकर एक अलग ही उत्साह रहता है. इसका रंग करीब तीन पखवाड़ा पहले से ही मिथिलावासियों पर चढ़ जाता है. वसंत पंचमी पर भगवती सरस्वती के चरण में अबीर अर्पण के साथ यहां रंग-गुलाल उड़ने लगते हैं. इसी दिन से फाग गायन की भी परंपरा रही है. रात में भोजन आदि से निवृत्त होकर टोली, मंदिर-ठाकुरवाडी या किसी दरवाजे पर जुट जाती और पारंपरिक होली गीतों के बोल नीरव रात को भी अपनी मदमस्त करने वाली भावधारा में बहा ले जाती.गांव-गांव में हुआ करती थी फाग गाने वालों की टोलियां
गांव-गांव में फाग गायन करने वालों की टोलियां हुआ करती थी. शायद ही कोई ऐसा गांव रहा हो, जहां टोली नहीं थी. जैसे ही डंफे पर थाप पड़ती उम्र-वर्ग के सारे फर्क मिट जाते और जीवन में आनंददायी मादक उमंग का नव संचार करने वाले फाग गायन में सभी समवेत हो जाते थे. पुरानी पीढ़ी के साये में नई पीढ़ी तैयार होती थी. लेकिन, अब यह दृश्य विरले गांव में ही दिखते हैं. वहां भी नई पीढ़ी इससे दूर ही नजर आती है. फूहड़ गीतों पर ठुमके लगाते जरूर लोग नजर आ जाते हैं.आधुनिकता के अंधानुकरण में भूल रहे अपनी संस्कृति
होली गायन की परंपरा के डोर टूटने की वजह आधुनिकता के अंधानुकरण में अपनी संस्कृति के प्रति बढ़ते हेय भाव और पलायन प्रमुख कहा जा सकता है. लोक गीतों के मर्मज्ञ मैथिली साहित्यकार डाॅ योगानंद झा कहते हैं कि रोजी-रोटी की मजबूरी में गांव छोड़ने के कारण टोलियां टूट गई. परंपरा विभंजक मानसिकता एवं साजिश के तहत समाज में पैदा किए गए विभेद ने भी इस पर असर डाला है. अकेले नई पीढ़ी को दोष देना सही नहीं है. इसके लिए संपूर्ण समाज को जड़ से जुड़ने के लिए समवेत प्रयास करना चाहिए.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
