Darbhanga News: वैदिक काल से वसुधैव कुटुंबकम् का सिद्धांत भारतीय चेतना में निहित

Darbhanga News:मुख्य वक्ता पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. अरविंद कुमार ने विवेकानंद को राष्ट्रभक्त, युवाओं का प्रेरणास्रोत, साधक, संन्यासी और दूरदर्शी विचारक बताया.

Darbhanga News: दरभंगा. लनामिवि के पीजी इतिहास विभाग तथा डॉ प्रभात दास फाउंडेशन की ओर से “स्वामी विवेकानंद का वसुधैव कुटुंबकम चिंतन ” विषय पर मंगलवार को संगोष्ठी हुई. मुख्य वक्ता पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. अरविंद कुमार ने विवेकानंद को राष्ट्रभक्त, युवाओं का प्रेरणास्रोत, साधक, संन्यासी और दूरदर्शी विचारक बताया. कहा कि संन्यास की अवधारणा का उल्लेख उपनिषदों, विशेष रूप से कठोपनिषद में है. इस विचार से स्पष्ट होता है कि संपूर्ण पृथ्वी और संसार एक परिवार है तथा सभी प्राणियों में एक ही आत्मा का वास है. प्रो. कुमार ने कहा कि वैदिक काल से ही वसुधैव कुटुंबकम् का सिद्धांत भारतीय चेतना में निहित रहा है. इसे यदि आज के वैश्विक संकटों के संदर्भ में अपनाया जाए, तो विश्व-कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है. स्वामी विवेकानंद के काशी प्रवास का उल्लेख करते हुए कहा कि वहीं उनके चिंतन में निर्णायक परिवर्तन आया. इसके बाद वे शिकागो गए. शिकागो के धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट किया कि सभी धर्म अलग-अलग मार्गों से एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं. सभी धर्मों का सार एक है. यही भारत की सभ्यतागत पहचान है. कहा कि विवेकानंद ने विश्व मंच पर भारत की संस्कृति, सहिष्णुता और समन्वयवादी दृष्टि का प्रभावशाली परिचय दिया. उनका वसुधैव कुटुंबकम् चिंतन वैश्विक आयाम लिए हुए था, जिसमें भारत को विस्तारवादी नहीं बल्कि समन्वयवादी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया.

विवेकानंद के विचारों को व्यवहार में आत्मसात करना आवश्यक- प्रो. संजय

विभागाध्यक्ष प्रो. संजय झा ने कहा कि स्वामी विवेकानंद को केवल पाठ्यक्रमों तक सीमित नहीं रखकर उनके विचारों को व्यवहार में आत्मसात करना आवश्यक है. विवेकानंद का चिंतन व्यक्ति, समाज और संपूर्ण सृष्टि को जोड़ने वाला है. प्रो. झा ने “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” की अवधारणा की चर्चा करते हुए कहा कि वेदांत ज्ञान का प्रकाश है, जो आत्मा के भीतर स्थित है. जब यह प्रकाश सभी तक पहुंचता है, तब ही मानव कल्याण संभव होता है. विवेकानंद के चिंतन के तीन मूल स्तंभ कर्मयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व और सेवा-भाव पर बल दिया. कहा कि वैश्वीकरण ‘मैं’ और बाजार की भाषा बोलता है, जबकि वसुधैव कुटुंबकम् ‘हम’ और परिवार की भावना को स्थापित करता है. परिवार में प्रेम, समन्वय और समाधान होता है, जबकि बाजार में प्रतिस्पर्धा और संघर्ष, भारतीय चिंतन लेने की नहीं, देने की परंपरा का है.

विवेकानंद भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के वैश्विक प्रतिनिधि- डॉ खान

इससे पहले विषय प्रवेश कराते हुए डॉ अमीर अली खान ने प्रधानमंत्री के “विकसित भारत” की संकल्पना को रेखांकित किया. कहा कि स्वामी विवेकानंद का चिंतन राष्ट्रनिर्माण और सांस्कृतिक चेतना की सशक्त वैचारिक आधारशिला है. वेदांत दर्शन और योग की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए विवेकानंद को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का वैश्विक प्रतिनिधि बताया. धन्यवाद ज्ञापन फाउंडेशन के मुकेश कुमार झा ने किया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Author: PRABHAT KUMAR

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >