कमतौल. अहल्यास्थान में एक पखवाड़ा तक चलने वाले रामनवमी मेले में सुबह-शाम दो, तीन व चार पहिया वाहन के अलावा आसपास गांव के श्रद्धालु परिजनों के साथ पैदल भी पहुंच रहे हैं. मंदिरों में दर्शन-पूजन कर अधिकांश श्रद्धालु अहिला से मुक्ति के लिए बैगन का भार व सुख-समृद्धि के लिए मिट्टी के बने कोठी में सात प्रकार के मिश्रित अनाज, जिसे सतंजा कहा जाता है, चढ़ाते हैं. बताया जाता है कि फसल कटाई के बाद भगवान को नया अन्न समर्पित कर उपयोग में लाने की परंपरा है. इसी के तहत श्रद्धालु मिट्टी की छोटी कोठी बनाकर उसमें सात प्रकार के अनाज भर देते हैं. रामनवमी मेले के दौरान मंदिरों में चढ़ाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. मान्यता है कि परिवार सालभर खुशहाल रहेगा व धन-धान्य की कमी नहीं होगी. आचार्य श्याम शास्त्री बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में हर ऋतु में कोई न कोई पर्व आता है. ऋतु परिवर्तन को मनाने के लिए व्रत, पर्व व त्योहारों की एक शृंखला है, जो लोक जीवन को निरंतर आबद्ध किए हुए हैं. शनिवार को अहल्या गहबर में पुजारन अवंतिका मिश्र, उनके पति कामेश्वर मिश्र, सिया-पिया निवास में अवधेश ठाकुर, अनिल कुमार, राम-जानकी मन्दिर में पुजारी दुखमोचन ठाकुर व न्यास समिति के अध्यक्ष बालेश्वर ठाकुर श्रद्धालुओं को दर्शन पूजन कराने में मशगूल थे. सुबह साढ़े दस बजे अहल्या गहबर में दो दर्जन से अधिक श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए कतारबद्ध नजर आए. पुजारी कामेश्वर मिश्र ने बताया कि दर्शन-पूजन के बाद श्रद्धालु मेले में आवश्यक सामान की खरीदारी करेंगे. मीना बाजार में सौंदर्य प्रसाधन सामग्री के अलावा लोहे के बने औजार, जांता-सिलौटी तथा लकड़ी के बने घरेलू उपयोग के सामान व फर्नीचर खरीदकर ले जाएंगे.
अहल्यास्थान में भगवती को श्रद्धालु समर्पित कर रहे सतंजा
अहल्यास्थान में एक पखवाड़ा तक चलने वाले रामनवमी मेले में सुबह-शाम दो, तीन व चार पहिया वाहन के अलावा आसपास गांव के श्रद्धालु परिजनों के साथ पैदल भी पहुंच रहे हैं.
