Darbhanga News: जिले के अलीनगर प्रखंड क्षेत्र में रसोई गैस की भारी किल्लत और इसे प्राप्त करने के लिए मची मारामारी ने आम उपभोक्ताओं का जीना मुहाल कर दिया है. शनिवार को आसमान से बरसती आग और चिलचिलाती धूप के बीच प्रखंड मुख्यालय स्थित ‘मेसर्स सूरज भारत गैस एजेंसी’ के गोदाम पर एक बेहद दर्दनाक और परेशान करने वाला नजारा देखने को मिला. यहाँ गैस सिलेंडर लेने के लिए सैकड़ों की संख्या में महिला और पुरुष उपभोक्ता सुबह से ही कतारों में खड़े रहने को मजबूर थे.
छांव तलाशने को मजबूर हुए बेबस उपभोक्ता
भीषण गर्मी और तीखी धूप का आलम यह था कि लोग कतार में सीधे खड़े रहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. कई उपभोक्ताओं ने धूप से बचने के लिए अपने-अपने सिलेंडरों को कतार (लाइन) में लगा दिया था और खुद सामने कहीं पेड़ों या दीवारों की छांव में खड़े अथवा बैठे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. हालांकि, राहत की बात यह थी कि गोदाम पर गैस सिलेंडरों की नई खेप पहुंच चुकी थी और प्रशासनिक व एजेंसी स्तर पर वितरण का कार्य भी शुरू किया जा चुका था, लेकिन उमड़ी हुई भारी भीड़ के कारण व्यवस्था पूरी तरह बेकाबू नजर आई.
बुकिंग के बाद भी 5 दिनों का लंबा इंतजार
गैस वितरण केंद्र पर मौजूद आक्रोशित उपभोक्ताओं ने अपनी समस्याओं को साझा करते हुए एजेंसी के नियमों पर गंभीर सवाल उठाए. कई उपभोक्ताओं का कहना था कि कड़े नियमों के मुताबिक गैस की ऑनलाइन रीफिल बुकिंग पिछले उठाव के पूरे 45 दिनों के बाद ही किया जाना संभव हो पाता है. इस कड़े प्रतिबंध के बावजूद, जब वे बुकिंग कर देते हैं, तो उसके पांच दिनों बाद ही उन्हें सिलेंडर दिया जाता है. उपभोक्ताओं ने दर्द बयां करते हुए कहा कि बुकिंग के बाद भी वितरण स्थल पर पहुंचकर उन्हें सारे-सारे दिन की कठिन ‘तपस्या’ करनी पड़ती है, तब जाकर कहीं एक अदद रसोई गैस सिलेंडर नसीब हो पाता है.
लकड़ी और गोइठे के सहारे भोजन बनाने की मजबूरी
इस किल्लत का सीधा असर ग्रामीण इलाकों के बजट्स और महिलाओं की सेहत पर पड़ रहा है. कई उपभोक्ताओं ने बताया कि एक सिलेंडर बमुश्किल 15 से 25 दिन ही चल पाता है. नियमों के कारण अगले 45 दिनों से पहले दूसरी बुकिंग नहीं हो पाती, जिसके चलते शेष दिनों में उन्हें मजबूरन पारंपरिक चूल्हे पर लकड़ी, सूखे पत्ते तथा गोइठे (उपले) के सहारे भोजन तैयार करना पड़ता है. इससे ‘उज्ज्वला योजना’ और धुआं मुक्त रसोई के दावों की भी पोल खुलती नजर आ रही है.
₹3000 तक पड़ रही है कीमत
इस गैस किल्लत की सबसे बड़ी मार गरीब और मजदूर तबके पर पड़ रही है. गोदाम पर कतार में खड़े दिहाड़ी मजदूरों ने बताया कि सुदूर इलाकों से एक सिलेंडर प्राप्त करने के लिए उन्हें सिलेंडर की तय सरकारी कीमत के अलावा तीन से चार सौ रुपये केवल ऑटो रिक्शा वाले को भाड़े के रूप में देना पड़ता है. इसके साथ ही वितरण केंद्र पर दिनभर लाइन में लगे रहने के कारण उनकी उस दिन की दैनिक मजदूरी भी मारी जाती है. अगर सिलेंडर की मूल कीमत में ऑटो का भाड़ा और अपनी छूटी हुई मजदूरी को भी जोड़ दें, तो एक सिलेंडर की वास्तविक कीमत गरीब मजदूरों के लिए ₹2500 से ₹3000 तक पड़ जाती है, जो उनके साथ सरासर अन्याय है. उपभोक्ताओं ने जिला प्रशासन से अलीनगर में सुचारू और पारदर्शी गैस वितरण प्रणाली सुनिश्चित करने की मांग की है.
