साहब! मेरे लिए साल के 12 महीने एक ही जैसे

मोतिहारी : पौष की रात में भले कौन बिना रजाई व कंबल के रह सकता है, इसमें यदि अलाव की व्यवस्था हो जाये, तो उसका कहना ही क्या. ऐसे में गरीबी क्या चीज होती है. इसका सहज अनुमान एक गुजराती परिवार से लगाया जा सकता है. प्रभात खबर ने पीड़ित परिवार का दर्द जानने सदर […]

मोतिहारी : पौष की रात में भले कौन बिना रजाई व कंबल के रह सकता है, इसमें यदि अलाव की व्यवस्था हो जाये, तो उसका कहना ही क्या. ऐसे में गरीबी क्या चीज होती है. इसका सहज अनुमान एक गुजराती परिवार से लगाया जा सकता है. प्रभात खबर ने पीड़ित परिवार का दर्द जानने सदर प्रखंड पहुंचे, तो उनकी व्यथा सुन कर दंग रह गये.

वर्षों पहले मां का साया उठ जाने के बाद श्री कृष्णा अपने साथ-साथ तीन बच्चों व वृद्ध पिता का भरन-पोषण कर रहे हैं. बताया कि गर्मी हो चाहे बरसात मेरे लिये साल के बारह महीने एक समान ही है.
परिवार के मुखिया श्री कृष्णा बताते हैं कि, वे मूल रूप से गुजरात के अहमदाबाद के रहनेवाले हैं. काम के सिलसिले में बिहार का रुख किये, लेकिन सही तरीके का काम नहीं मिला. हां यह सही है कि सदर प्रखंड में रहने के लिए जगह जरूर मिल गया. बताया कि कभी भीख मांगकर, तो कभी
प्लास्टिक का फुल बेचकर काम चला रहे हैं, लेकिन इससे जीवन में बदलाव नहीं आयेगा. बताया कि तीन बच्चों में एक बेटी ज्योती, बेटा सागर व अर्जुन है. इन तीनों की उम्र करीब 10 से 11 के बीच है. गरीबी के बावजूद इन तीनों को खुश रखने के लिए दिन-रात एक कर दिये हैं. इसी दौरान वह भावुक हो गये. कहने लगे कि, जिस तरह मेरी स्थिति है यह स्थिति भगवान किसी और
को मत देना… इतना कह कर वह प्रभात खबर की टीम से कहा, सर अब मुझे भीख मांगने में देरी हो रही है. मुझे जाने दीजिए.
गुजराती परिवार की दास्तां
वर्षों पहले उठ चुका है मां का साया
सदर प्रखंड के भंडार गृह के बरामदे को बनाया अपना आशियाना
परिवार में एक पुत्री व दो पुत्रों के साथ एक वृद्ध पिता हैं शामिल
प्रशासन की हद
हद तो यह है कि सीडीपीओ ग्रामीण तथा मनरेगा कार्यक्रम पदाधिकारी का कार्यालय समीप है. लेकिन किसी की नजर इस परिवार पर नहीं पड़ी. लेकिन सरकार व अनगिनत स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा कई मुकम्मल व्यवस्था कागजों में की गयी है. इस ठिठुरती ठंड के नाम पर सरकार के करोड़ों रुपये खजाने से खाली होना लाजिमी है.

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