बिहार शिक्षा व्यवस्था पर सवाल: स्कूलों में उपकरण तो आए, लेकिन संगीत शिक्षक नहीं

Buxar News: बक्सर के स्कूलों में सरकार ने संगीत के लिए ढोलक, मंजीरा, कैसियो जैसे महंगे वाद्य यंत्र दिए, लेकिन ज्यादातर जगह संगीत शिक्षक ही नहीं हैं. इसलिए लाखों-करोड़ों के उपकरण स्कूलों में इस्तेमाल नहीं हो पा रहे और बिना प्रशिक्षण के योजना जमीनी स्तर पर फेल जैसी दिख रही है.

Buxar News(संतोष कांत): बिहार शिक्षा विभाग की अदूरदर्शिता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि जिले के स्कूलों में बच्चों को ‘सा रे गा मा’ सिखाने के लिए चमचमाते वाद्य यंत्र और महंगे साउंड सिस्टम तो भेज दिए गए, लेकिन उन्हें छूने वाला कोई नहीं है. बक्सर जिले के प्राथमिक, मध्य और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में ‘स्कूल के अनुसार संगीत शिक्षक नहीं होना’ इस पूरी योजना की हवा निकाल रहा है.

18,000 रुपये के म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट

राज्य सरकार ने खजाने से ₹158.44 करोड़ खर्च कर सूबे के स्कूलों में प्रति विद्यालय ₹18,000 रुपये के म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट (ढोलक, मंजीरे, कैसियो आदि) की आपूर्ति तो कर दी, लेकिन बक्सर जिले के जमीनी हालात यह हैं कि यहां के सैकड़ों प्राइमरी और मिडिल स्कूल में संगीत शिक्षक के पद शून्य हैं.

जब सिखाने वाले गुरुजी ही नहीं हैं, तो इन महंगे सामानों का उपयोग कौन करेगा?यह सवाल आज जिले के हर स्कूल में गूंज रहा है.

हाई स्कूलों का गणित: पदों के मुकाबले मुट्ठी भर शिक्षक

प्राथमिक और मध्य विद्यालयों की बात तो छोड़िए, जिले के माध्यमिक और उच्च माध्यमिक (हाई स्कूलों) की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है. पूरे राज्य में 10,800 माध्यमिक विद्यालयों के लिए करीब ₹19.44 करोड़ के वाद्य यंत्र खरीदे गए हैं. लेकिन विभागीय आंकड़ों की मानें, तो पूरे सूबे में संगीत शिक्षकों के स्वीकृत पदों के मुकाबले महज 2,900 शिक्षक ही कार्यरत हैं.

बक्सर जिले में भी यही आनुपातिक संकट है. जिले के अधिकांश हाई स्कूलों में संगीत शिक्षक का पद सालों से खाली पड़ा है. गिने-चुने स्कूलों में ही संगीत के शिक्षक तैनात हैं. ऐसे में जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, वहां यह करोड़ों की इन्वेंट्री बंद कमरों में जंग खाने और धूल फांकने को मजबूर है.

पहले रिक्त पदों को भरा जाना चाहिए था

​शिक्षक संगठनों और शिक्षाविदों ने सरकार की इस नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं. बिना बहाली के खरीदारी क्यों. पहले विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को भरा जाना चाहिए था, उसके बाद संसाधन उपलब्ध कराए जाने थे.

शिक्षकों की भारी कमी

बक्सर जिले के कई प्रखंडों के मध्य विद्यालयों में सामान्य विषयों के शिक्षकों की कमी है, संगीत शिक्षक की बात तो दूर की बात है. संगीत को बच्चों के मानसिक विकास का जरिया बताया गया, लेकिन शिक्षक के अभाव में बच्चे इन उपकरणों को छू तक नहीं पा रहे हैं.

प्रधानाध्यापकों की दोहरी मुसीबत, सामान्य शिक्षक कैसे कराएं राग का रियाज?

जिले के एक मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए कहा कि हमारे स्कूल में गणित और विज्ञान के शिक्षक मुश्किल से काम संभाल रहे हैं. संगीत का कोई पद ही नहीं है. अब विभाग कह रहा है कि इन वाद्य यंत्रों का उपयोग कर रिपोर्ट भेजो. क्या अब भाषा या सामाजिक विज्ञान के शिक्षक बच्चों को हारमोनियम और कैसियो पर राग भैरवी का रियाज कराएंगे? यह पूरी तरह से हास्यास्पद है. शिक्षकों का साफ कहना है कि बिना विशेषज्ञ शिक्षक और बिना ट्रेनिंग के इन महंगे उपकरणों को सिर्फ अलमारी में बंद करके रखा जा सकता है, जो अब चोरी होने के डर से उनके गले की फांस बन चुका है.

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Published by: Suryakant Kumar

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