कतकौली का ऐतिहासिक मैदान इस बार भी चुनाव में नहीं बना मुद्दा

इतिहास के पन्नों में दर्ज कतकौली का लड़ाई मैदान बदहाल है. यह वही स्थल है जहां स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी.

बक्सर. इतिहास के पन्नों में दर्ज कतकौली का लड़ाई मैदान बदहाल है. यह वही स्थल है जहां स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, लेकिन आज यह गौरवशाली अतीत अपना पहचान और अस्तित्व खोने के कगार पर है. मगर दुख की बात है यह है कि बक्सर विधानसभा चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के लिए चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है. किसी भी राजनीति दल का ध्यान इस पर नहीं है. विभिन्न पार्टियों की उदासीनता के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होते जा रहा है. कतकौली का यह मैदान न सिर्फ बक्सर जिले के लिए बल्कि पूरे बिहार के गौरव का प्रतीक रहा है. यह वह स्थान है जहां अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी गयी थी. लेकिन आज इस मैदान की स्थिति देखकर किसी भी इतिहास प्रेमी का मन व्यथित हो उठता है.चारों ओर उगी झाड़ियां, टूटे हुए स्मारक, बिखरी कुर्सियां और जर्जर सड़कें ये सब इस बात के गवाह हैं कि प्रशासन की नजर इस दिशा में नहीं है और न ही चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों का. मैदान तक पहुंचने वाली सड़क की हालत इतनी खराब है कि स्थानीय लोग भी वहां जाने से कतराते हैं. सड़क जगह-जगह टूटी हुई है, कीचड़ और गड्ढों से भरी हुई है. जब कभी दूर-दराज से पर्यटक या इतिहास प्रेमी यहां पहुंचते हैं तो वे मैदान के अंदर जाने से पहले ही लौट जाते हैं. स्थानीय निवासी मुकेश बताते हैं कि कई बार नगर परिषद और जिला प्रशासन से सड़क मरम्मत की मांग की गयी, लेकिन अब तक केवल आश्वासन ही मिला है. मैदान के अंदर हालात और भी चिंताजनक हैं. कभी यहां बैठने के लिए बनी कुर्सियां और बेंच आज टूटी और बिखरी पड़ी हैं. मैदान में लाइट सिस्टम नहीं है. रात के समय तो दूर, दिन में भी लोग मैदान में जाने से डरते हैं क्योंकि चारों ओर वीरानी और असुरक्षा का माहौल है. नगर परिषद बक्सर द्वारा मैदान के पास कुछ दिन पहले एक वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया था, ताकि मैदान देखने आने वाले लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो सकें. शुरुआत में लोगों को उम्मीद थी कि इससे कुछ सुधार होगा, लेकिन प्लांट शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद खराब हो गया. स्थानीय नागरिक राकेश ने बताया कि कई बार शिकायत दर्ज कराने के बावजूद न तो मरम्मत करायी गयी और न ही किसी ने यह देखने की जहमत उठाई कि आखिर सार्वजनिक योजना बेकार क्यों पड़ी है. अब यह प्लांट कबाड़ का ढेर बन चुका है.

इतिहासकारों और स्थानीय बुद्धिजीवियों का कहना है कि कतकौली का मैदान बिहार के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यहां की लड़ाई ने उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आम जनता में संघर्ष की नई चेतना जगायी थी. इस मैदान पर बने स्मारक, शिलालेख और पत्थर आज भी उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाते हैं. लेकिन इन स्मारकों का संरक्षण न होने के कारण यह धरोहर भी धीरे-धीरे मिटती जा रही है. मैदान में बना विजय स्तंभ भी अब टूटने के कगार पर है. कहीं पत्थर उखड़ गए हैं, कहीं दरारें आ चुकी है. कुछ हिस्सों में तो स्तंभ के चारों ओर झाड़ियां और घास पूरी तरह उग आयी हैं. स्थानीय लोगों ने कई बार अपने स्तर पर सफाई अभियान चलाने की कोशिश की, लेकिन बिना प्रशासनिक सहयोग के कोई बड़ा सुधार संभव नहीं हो पाया. कतकौली के इस ऐतिहासिक स्थल को देखने देश के विभिन्न हिस्सों से पर्यटक आते हैं, लेकिन उन्हें यहां सुविधाओं का अभाव खलता है. न तो यहां कोई मार्गदर्शक बोर्ड लगा है, न बैठने या विश्राम की कोई समुचित व्यवस्था. यहां तक कि मैदान में लगे सूचना बोर्ड पर भी अब धूल जम चुकी है और कई जगह अक्षर मिट गये हैं. विनोद राय बताते हैं,यह जगह हमारे गर्व का प्रतीक है, लेकिन सरकार और जनप्रतिनिधियों ने इसे पूरी तरह भुला दिया है. हर चुनाव में नेता आते हैं, वादे करते हैं, लेकिन मैदान की सुध कोई नहीं लेता. अगर इस जगह का विकास किया जाये, सड़क सुधारी जाए, लाइट और पानी की व्यवस्था बहाल की जाए, तो यह क्षेत्र पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है. लेकिन फिलहाल तो यहां केवल उपेक्षा का माहौल है.

क्या कहते हैं लोग

कतकौली की ऐतिहासिक लड़ाई मैदान को जनप्रतिनिधियों द्वारा लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि अगर इस स्थल का सही तरह से विकास किया जाए, तो यह पर्यटन के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है और स्थानीय लोगों को भी इसका लाभ मिलेगा. 31 अक्टूबर- फोटो- 36- विजय कुमार सिंह

कतकौली की लड़ाई का मैदान, जो एक ऐतिहासिक और चर्चित स्थल है, उसके विकास पर अब तक किसी भी जनप्रतिनिधि का ध्यान नहीं गया है. अगर इस स्थल का समुचित विकास किया जाये, तो यह क्षेत्र पर्यटन और इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है. 31 अक्टूबर- फोटो- 37- अशोक कुमार सिंह

कतकौली लड़ाई का मैदान एक ऐतिहासिक स्थल है, जिसका विकास होना बेहद आवश्यक है. मगर अब तक किसी भी जनप्रतिनिधि ने इस दिशा में ध्यान नहीं दिया है, जबकि अगर इसका विकास किया जाये तो यह पर्यटन की दृष्टि से एक आकर्षक स्थल बन सकता है. इससे लोगों के आने-जाने में वृद्धि होगी, यह क्षेत्र घूमने का प्रमुख केंद्र बनेगा और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी प्राप्त होगा. 31 अक्टूबर- फोटो- 38- सुनील शर्मा

कतकौली की लड़ाई का मैदान और ऐतिहासिक केंद्र आज बदहाली की स्थिति में है. वहां जाकर यह एहसास ही नहीं होता कि यह स्थान कभी इतिहास का साक्षी रहा होगा. मगर इस पर न तो किसी जनप्रतिनिधि का ध्यान है और न ही यह किसी के चुनावी मुद्दे में शामिल है. नीतीश मिश्रा का मानना है कि इस ऐतिहासिक स्थल का समुचित विकास होना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सकें. 31 अक्टूबर- फोटो- 39- नीतीश मिश्रा

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Published by: Amlesh prasad

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