buxar news : ग्रामीण क्षेत्रों में बनाये गये 143 सार्वजनिक शौचालय में से 74 पड़े हैं बेकार

buxar news : सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण में खर्च किये गये थे 4.29 करोड़ रुपयेमेंटेनेंस के अभाव में छोटे-मोटे कारणों से 50 प्रतिशत हो गये अनुपयोगी

बक्सर. जिले में बनाये गये 50 प्रतिशत सार्वजनिक शौचालय छोटे-मोटे कारणों से बंद पड़े हैं. किसी सार्वजनिक शौचालय में पाइप जाम है, किसी का दरवाजा टूटा है, किसी में पानी के लिए लगाये गये चापाकल खराब, तो किसी में सीट क्षतिग्रस्त होने के कारण बंद पड़ा है

जबकि, मेंटेनेंस की जिम्मेदारी पंचायत के मुखिया के पास है. परंतु किसी सार्वजनिक शौचालय को कोई देखना वाला नहीं है. ग्रामीण कार्य विकास विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले में लगभग 143 सार्वजनिक शौचालय का निर्माण कराया गया, जिसमें से 74 छोटे-मोटे कारणों से बंद पड़े हैं व बेकार पड़े हैं, जिसकी वजह से स्वच्छ भारत मिशन के अभियान के तहत खुले में शौच मुक्त जिले का सपना अधूरा है. प्रत्येक वर्ष जिले में स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए स्वच्छता ही सेवा अभियान के तहत 17 सितंबर से दो अक्तूबर तक अभियान चलाया जाता है, लेकिन इस अभियान में सार्वजनिक शौचालय के प्रति जिला प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है. सार्वजनिक शौचालय बंद होने से सबसे अधिक समस्या महिलाओं को होता है. करीब चार करोड़ 29 लाख रुपये की लागत से ये शौचालय बनाये गये थे. प्रत्येक शौचालय पर औसतन 3 लाख रुपये खर्च किये गये थे, लेकिन ये पैसा अब ग्रामीणों के लिए किसी काम का नहीं रह गया, क्योंकि ये ढांचे अब या तो खंडहर बन चुके हैं या फिर दरवाजे में ताला बंद है.

टूट रहा स्वच्छ भारत का सपना

जिले को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है. जबकि, हर साल 17 सितंबर से 2 अक्तूबर तक स्वच्छता ही सेवा अभियान भी चलाया जाता है. लेकिन ये महज कागजों तक सीमित है. जमीनी हकीकत यह है कि दर्जनों गांवों में भूमिहीन गरीब परिवार के लोग आज भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं. कारण साफ है, जो शौचालय बने थे, उनमें से 50 प्रतिशत अब उपयोग लायक ही नहीं हैं.

पंचायतों को है रखरखाव की जिम्मेदारी

खुद ग्रामीण कार्य विकास विभाग के सूत्रों की माने, तो जिले में बनाये गये 143 सार्वजनिक शौचालयों में से 74 बंद पड़े हैं. इनकी स्थिति है कि कई शौचालयों में पाइपलाइन जाम है, जिससे गंदगी बह नहीं पाती, कुछ के दरवाजे टूटे हैं, जिससे महिलाएं इस्तेमाल नहीं कर पातीं, कई शौचालयों में पानी की व्यवस्था नहीं है, कई के चापाकल खराब हैं या नल से नहीं जुड़ा, कई स्थानों पर सीटें टूट चुकी हैं, जिससे बैठना मुश्किल है, कहीं पर शौचालय का ढांचा ही दरारों से भर चुका है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन शौचालयों को कोई देखने वाला नहीं है. रखरखाव की जिम्मेदारी पंचायतों को दी गयी थी, लेकिन ज्यादातर पंचायतों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया.

मेंटेनेंस के लिए तय नहीं हुआ बजट, न ही रखे गये सफाईकर्मी

शौचालय निर्माण के बाद यह माना गया कि पंचायत स्तर पर मेंटेनेंस की व्यवस्था की जायेगी. लेकिन न तो इसके लिए स्थायी बजट तय किया गया, न ही कोई स्थायी सफाईकर्मी रखा गया. कुछ जगहों पर जब ग्रामीणों ने शिकायत की, तो जवाब मिला, पैसा नहीं है, कुछ हो नहीं सकता. ऊपर से आदेश आयेगा तब देखा जायेगा. यहां बड़ा सवाल यह है कि यदि शौचालय बनाये गये थे, तो उसके संचालन की व्यवस्था क्यों नहीं की गयी. जब निर्माण में करोड़ों रुपये खर्च किये जा सकते हैं, तो रखरखाव के लिए कुछ हजार रुपये मासिक खर्च क्यों नहीं हो सकते.

महिलाओं को हो रही ज्यादा परेशानी

बंद शौचालयों की सबसे बड़ी मार ग्रामीण महिलाओं पर पड़ी है. उन्हें अंधेरे में, झाड़ियों या खेतों में शौच के लिए जाना पड़ता है, जो न केवल असुविधाजनक है, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक है. उमरपुर निवासी प्रियंका देवी ने बताया कि शौचालय बना था, लेकिन दो महीने भी ठीक से नहीं चला. पानी ही नहीं आता था. अब ताला लगा है. हम सुबह चार बजे निकलते हैं खेत की ओर, ताकि कोई देख न ले. खुले में शौच से न केवल पारिस्थितिकीय नुकसान होता है, बल्कि इससे जुड़े स्वास्थ्य संकट भी उभरते हैं. दूषित जलस्रोत, डायरिया, पेचिश, त्वचा रोग जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं. बच्चों और बुजुर्गों में बीमारियों की दर अधिक हो जाती है. ऐसे में जब सरकार हर साल करोड़ों रुपये स्वच्छता अभियान पर खर्च कर रही है, तब जमीनी स्तर पर इन सार्वजनिक शौचालयों की उपेक्षा पूरे अभियान की सफलता पर सवाल खड़ा करता है.

15वीं वित्त से करनी है शौचालयों की मरम्मत

जिले में बनाये गये सार्वजनिक शौचालयों की मरम्मत पंचायत के फंड से 15वीं वित्त की राशि से करनी है, लेकिन न इस पर मुखिया का ध्यान है न पंचायत सचिव का. जबकि जिले की सभी पंचायतों में एक-एक स्वच्छता पर्यवेक्षक समेत सभी वार्ड में स्वच्छताकर्मी रखे गये हैं, ताकि शहर के तर्ज पर गांव में भी साफ-सफाई नियमित रूप से किया जा सके. इन सभी का मानदेय 15वीं वित्त से दिया जाता है, लेकिन जो मूल सुविधा महिलाओं के लिए उस पर किसी का ध्यान नहीं है. खास बात यह है कि जिला प्रशासन द्वारा बहुत सारे ऐसे सार्वजनिक शौचालय बनाये गये हैं, जो बंद हैं. उसे भी चालू दिखाया गया है. जब सत्यता की जांच करने प्रभात खबर की टीम उमरपुर पंचायत के बड़कागांव में पहुंची, तो पाया कि बहुत दिन से बंद पड़ा है. लेकिन उसे जिला प्रशासन के आंकड़े में चालू दिखाया गया है.

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Published by: Shailesh kumar

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